-स्नेहा
इन दिनों
कुछ व्याकुलता है
मेरे अन्दर
मैं लिखना चाहती हूं
एक कविता
ऐसी कविता
जिसमे जीवन की जटिलतायें न हो
न हो उसमें
जीवन का संघर्ष जुझारूपन जैसी कठोर संवेदनायें
उस कविता में हो
सिर्फ़ और सिर्फ़
फ़ूल, रंग, चांद, सितारे, इन्द्रधनुष
प्यार और सपने
पर मै नहीं लिख पाती
ऐसी कविता
मैं सोचती हूं फ़ूल के विषय में
तो दिमाग में उतर पड़ती हैं
वर्तमान समय की जटिलतायें
सोचती हूं चांद सितारों के बारे में
तो अंधियारी पाख का अंधेरा
ढक लेता है इन सब को
कल्पना करती हूं इन्द्रधनुष की
और कोशिश करती हूं
उसके सतरंगी सपनों में डूबने की
तो इसके रंग
हाथ से फ़िसलने लगते है
और भविष्य का संघर्ष
मन को ढकने लगता है
खुद को जुझारू बनाने का संघर्ष
कविता पर हावी होने लगता है।