(१८ मई २०११, ज्येष्ठ महीने का पहला दिन)
स्नेहा
१)
जबकि बहुत गर्म और
बेचैनी भरी होनी चाहिये थी,
बहुत खूबसूरत थी आज की शाम
बादलों ने
हवा की झाड़ू थाम कर
धो डाला है सब कुछ
आसमान से धरती के बीच
सब कुछ चमकदार हो उठा है
और खुशी से लकदक है
इस वृहद सफ़ाई में बहा पानी
धरती पर अभी भी
जहां-तहां पड़ा थिरक रहा है
इस अमृत को
धरती घूंट-घूंट
अपने अन्दर भर रही है
हवा मे एक अद्भुत लय है
जिस पर टहनियां झूम रही हैं
ताली बजा रहे है पत्ते
कोयल कूं – कूं गीत गाकर
प्रेमियों को मिलन की दावत दे रही है
सारी प्रकृति चाहती है
कि प्रेम करने वाले मिलें
ताकि
धरती का श्रृंगार पूरा हो सके
प्रकृति की इस इच्छा के विरूध्द
हम पर पहरा डाले खड़ी हैं
जेल की बद्सूरत सलाखें
और ऊंची दीवारें ।
२)
रात और भी खूबसूरत थी
पहला पहर सुरीला और काला
यमुना से नहा – नहा कर
निकली थी हवायें
दूसरे पहर नहा कर निकला चांद
संग थे नन्हें मुन्ने सितारे
उनके नन्हें नन्हें हाथ पैर
थिरक रहे हैं रात की धुन पर
शायद आज ही सीखा है नाचना
इस नजारें को सब देखें -
पानी के छोटे-बड़े स्क्रीन लगा रखे हैं
धरती ने
छत, मैदान, सड़क, खेत खलिहान सब जगह,
आज की रात
धरती पर
हजारों-हजार चांद-तारे
उतर पड़े हैं ।
३)
बैशाख का महीना बीत गया
सूरज अपनी पूरी रौ में आ चुका था
ताप से हवा झुलस रही थी
बादलों ने सूरज से दगा किया
ज्येष्ठ के पहले दिन
झमाझम बरसा
और हवा का ताप चुरा ले गया ।