-स्नेहा
देश
मात्र ‘इमोशन‘ नही है मेरे लिये
इसकी भौतिक उपस्थिति है
मेरे अन्दर
इस धरती पर उपजे अन्न जल से
जन्मे थे मेरे माता पिता
और उनके माता पिता
उन्होनें जन्म दिया मुझे
और फिर
इसी धरती के अन्न जल से
पला बढ़ा मेरा शरीर
इस धरती की
आसमान से जमीन तक
उठती गिरती हवायें
मेरे फ़ेफ़ड़ों से होकर गुजरती हैं
इस धरती पर बहने वाली नदियां
मेरे अन्दर लहू बन कर दौड़ती हैं
यहीं की संस्कृति, रीति रिवाज़, रहन-सहन
ने ढाला है मेरे मस्तिष्क को
इसके चेतन अवचेतन को
इसी से उपजे विचार
मेरे लहू को लाल बनाते हैं
और मुझे उकसाते हैं
कि
मैं नफ़रत करूं उन से
देश जिनके लिए
एक ‘शब्द‘ मात्र है,
जिन्होने बेच खाया है
इस ‘शब्द‘ के
जल जंगल जमीन और
इसके पाताल-आसमान तक को।
कि मैं नफ़रत करूं उनसे,
देश भक्ति जिनके लिए
भारत पाकिस्तान का युद्ध
और दो समुदायों के बीच
नफ़रत मात्र है।
यह दिमाग ही है मेरा
जो मुझे उकसाता है
कि नफ़रत करूं उनसे भी
जो हर साल
१५ अगस्त २६ जनवरी को
लाल किले
और ऐसी ही अन्य इमारतों से
देश भक्ति का इमोशन बेचते है।
देश मेरे लिये एक इमोशन भर नहीं
बल्कि एक भौतिक जगत है
देशभक्ति
मेरे लिये एक इमोशनल शब्द भर नहीं
बल्कि एक ‘एक्टिविज्म‘ है।