Movement of thought

November 13, 2011

A shocking connection: film-maker uncovers Blood in the Mobile

Filed under: Cinema — movementofthought @ 10:15 am

[Frank Poulsen’s eye-opening new documentary exposes a link between the war in DR Congo and our mobile phones. This article was first published on http://www.guardian.co.uk/film/filmblog/2011/oct/10/blood-in-the-mobile-congo%5D

We all love our mobile phones, and the smarter they get, the more we want them. There is, though, a dark side to this affair. In the Democratic Republic of Congo, our demand for phones has been helping to finance a civil war which has killed more than 5m people. There is, according to the title of Danish director Frank Poulsen’s eye-opening documentary, blood in the mobile. Minerals from mines under the control of warring factions have been making their way into our mobiles for years. The UN raised the issue a decade ago. But even though it involves more of us than, say, blood diamonds, how many of us know about it?
I knew there was a war in Congo, but I didn’t know it had anything to do with my phone,” says Poulsen. “I think we often forget, or maybe don’t know, how closely connected we are. Things that go on in Africa seem to be very far away and have very little to do with us, but it has a lot to do with us. My mission, as a film-maker, is to make these connections.”
Poulsen arranged a research trip to Congo and successfully secured entry to the Bisie mine, located deep in the jungles of Walikale, where thousands of people, many of them children, were living and working in hellish conditions. “I have never seen anything like this,” says Poulsen. “This was really terrible.” Guards on a makeshift gate levied “taxes” on people going in and coming out. “And that’s how simple it is,” he says. “These armed groups are really stealing money from the poorest and most miserable people in the world.”
Inside the gate, conditions are “medieval”. “There’s no clean water anywhere. There’s thousands of people, and you think: ‘How do they survive here? How can they do this? How is it possible?'” Children as young as 12 work as deep as 100 metres below ground, and Poulsen tried seeing for himself what conditions were like inside the mine, but he didn’t get far. “I was simply too big and I had a camera that made it hard for me to get an everyday life atmosphere. People would just sit and look at me.”
The second – and final – time he visited Bisie, he gave a small camera to a young boy. The haunting images he captured, of men and children chiselling at rocks, grimly hark back to an age that seemed long gone, when Leopold II of Belgium ran the Congo as a private slave colony.
In an attempt to connect the dots between the mine and the phone industry, Poulson approached Nokia – as well-known advocates of corporate social responsibility, he thought they would be keen to show him what they were doing to improve the situation. They told him by email that they didn’t have the “resources” to help him. He says he rang them once a week for almost a year, trying to arrange an interview with someone in power, but found himself fobbed off at every turn. When he did eventually get access, it was to mid-level people whose apparently sincere desire to do the right thing was not matched by their ability to make actual changes.
“Nokia had the chance of being the hero of this film, if they had opened up to me. It is a mystery why they didn’t. But it also shows why this issue isn’t being solved: people are turning a blind eye.”
Blood in the Mobile arrives in the UK at a time when recent legislation passed by Congress in the US requiring more transparency in the extractive industry seems to already be making an impact in Africa, even before its implementation. Similar legislation is now being sought at an EU level. “We can’t leave it up to the companies themselves to solve,” says Poulsen, “because they have had a fair chance at it.”
The casualties of war in the DR Congo have been, he says, like a “Haiti earthquake every third month for the last 15 years. This is an extraordinary problem, a catastrophe that we have to address right now.
There are too many people dying.”

• Blood in the Mobile is released on 21 October
Production year: 2010
Runtime: 82 mins
Directors: Frank Piasecki Poulsen

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July 24, 2011

Ghalib and Marx

Filed under: History — movementofthought @ 2:34 pm

[This article was first published on http://kissago.blogspot.com/2008/08/blog-post.html and also on http://www.merinews.com/article/literary-encounter-between-ghalib-and-marx/137382.shtml – Ed]

क्या मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ और कार्ल मार्क्स एक दूसरे को जानते थे? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता था। लेकिन सच यह है कि दोनों एक दूसरे को जानते ही नहीं थे बल्कि उनके बीच ख़तों का आदान-प्रदान भी हुआ करता था। इन बहुमुल्य ख़तों को ख़ोज निकालने का श्रेय आबिदा रिप्ले को जाता है। आबिदा वॉयस ऑफ अमेरिका में कार्यरत हैं। इन ख़तों के ख़ोज की कहानी आबिदा के शब्दों में ही पढ़ लीजिए। मैंने सिर्फ़ अनुवादक की भूमिका निभा रहा हूं।

आज से ठीक पंद्रह वर्ष पहले मैं लंदन स्थित इंडिया ऑफ़िस के लाईब्रेरी गई थी। क़िताबों के आलमीरों के बीच मुगल काल की एक फटी-पुरानी क़िताब दिख गई। जिज्ञासावश उसे खोला तो उसके अंदर से एक पुराना पत्ता नीचे फ़र्श पर जा गिरा। पत्ते को उठाते ही चौंक पड़ी। लिखने की शैली जानी-पहचानी लग रही थी। लेकिन शक अभी भी था। पत्ते के अंत में ग़ालिब के हस्ताक्षर और मुहर नें मेरे संदेह को यक़ीन में बदल दिया।

घर लौटकर ख़लिक अंज़ुम की क़िताबों में चिट्ठियों के बारे में खोजा। लेकिन जो ख़त मेरे हाथ में था उसका ज़िक्र कहीं नहीं मिला। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि इस पत्र में ज़र्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स को संबोधित किया गया था। विडंबना यह है कि आजतक किसी इतिहासकार की नज़र इस ख़त पर नहीं गई।

पंद्रह साल के बाद आज मेरे हाथ मार्क्स का ग़ालिब के नाम लिखा गया पत्र भी लग गया है। उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर ग़ालिब और महान साम्यवादी विचारक मार्क्स….एक दूसरे से परिचित थे।

रविवार, 21 अप्रेल, १८६७
लंदन, इंग्लैंड
प्रिय ग़ालिब,
दो दिन पहले दोस्त एंजल का ख़त मिला। पत्र के अंत में दो लोईनों का ख़ूबसूरत शेर था। काफी मशक्कत करने पर पता चला कि वह कोई मिर्ज़ा ग़ालिब नाम के हिन्दुस्तानी शायर की रचना है। भाई, अद्भुत लिखते हैं! मैंने कभी नहीं सोचा था कि भारत जैसे देश में लोगों के अंदर आज़ादी की क्रांतिकारी भावना इतनी जल्दी आ जाएगी। लार्ड के व्यक्तिगत लाईब्रेरी से कल आपकी कुछ अन्य रचनाओं को पढ़ा। कुछ लाईनें दिल को छू गईं। “हमको मालूम है ज़न्नत की हक़ीकत लेकिन, दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है”। कविता के अगले संस्करण में इंकलाबी कार्यकर्ताओं को संबोधित करें: ज़मींदारों, प्रशासकों और धार्मिक गुरुओं को चेतावनी दें कि गरीबों, मज़दूरों का ख़ून पीना बंद कर दें। दुनिया भर के मज़दूरों, मुत्ताहिद हो जाओ।

हिन्दुस्तानी शेरो-शायरी की शैली से मैं वाकिफ़ नहीं हूं। आप शायर हो, शब्दों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। कुछ भी मौलिक लिखें, जिसका संदेश स्पष्ट हो – क्रांति। इसके अलावा यह भी सलाह दुंगा कि गज़ल, शेरो-शायरी लिखना छोड़ कर मुक्त कविताओं का आज़माएं। आप ज्यादा लिख पाएंगे और इससे लोगों को अधिक सोचने को मिलगा।

इस पत्र के साथ कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो का हिन्दुस्तानी संस्करण भेज रहा हूं। दुर्भाग्यवश पहले संस्करण का अनुवाद उपलब्ध नहीं है। अगर यह पसंद आई तो आगे और साहित्य भेजुंगा। वर्तमान समय में , भारत अंग्रेजी साम्राज्यवाद के मांद में परिवर्तित कर दिया गया है। और केवल शोषितों , मजदूरों के सामूहिक प्रयास से ही जनता को ब्रिटिश अपराधियों के शिकंजे से आजाद किया जा सकता है।
आप को पश्चिम के आधुनिक दर्शन के साथ-साथ एशियाई विद्वानों के विचारों का अध्ययन भी करना चाहिए। मुगल राजाओं और नवाबों पर झूठी शायरी करना छोड़ दें। क्रांति निश्चित है। दुनिया की कोई ताक़त इसे रोक नहीं सकती।

मैं हिंन्दुस्तान को क्रांति के निरंतर पथ पर चलने के लिए शुभकामना देता हूं।
आपका,
कार्ल मार्क्स
————————————————————————————————-

सितंबर 9, १८६७

कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के साथ तुम्हारा ख़त मिला। अब तुम्हारे पत्र का क्या ज़वाब दूं? दो बाते हैं….। पहली बात की तुम क्या लिखते हो, यह मुझे पता नहीं चल पा रहा है। दूसरी बात यह कि लिखने और बोलने के हिसाब से मैं काफी़ बूढ़ा हो गया हूं। आज एक दोस्त को लिख रहा था तो सोचा क्यों न तुम्हें भी लिख दूं।

फ़रहाद ( संदर्भ में ग़ालिब की एक कविता ) के बारे तुम्हारे विचार ग़लत हैं। फ़रहाद कोई मजदूर नहीं है, जैसा तुम सोच रहे हो। बल्कि, वह एक प्रेमी है। लेकिन प्यार के बारे में उसकी सोच मुझे प्रभावित नहीं कर पाए। फ़रहाद प्यार में पागल था और हर वक्त अपने प्यार के लिए आत्महत्या की बात सोचता है। और तुम किस इनकलाब के बारे में बात कर रहे हो? इनकलाब तो दस साल पहले 1857 में ही बीत गया! आज मेरे मुल्क के सड़को पर अंग्रेज़ सीना चौड़ा कर घूम रहे हैं, लोग उनकी स्तुति करते है…डरते हैं। मुगलों की शाही रहन-सहन अतीत की बात हो गई है। उस्ताद-शागिर्द परंपरा भी धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो रही है।

यदि तुम विश्वास नहीं करते तो कभी दिल्ली आओ। और यह सिर्फ़ दिल्ली की बात नहीं है। लखनऊ भी अपनी तहज़ीब खो चुकी है….पता नहीं वो लोग और अनुशासन कहाँ गुम हो गया। तुम किस क्रांति की भविष्यवाणी कर रहे हो??

अपने ख़त में तुमने मुझे शेरो-शायरी और गज़ल की शैली बदलने का सलाह दी है। शायद तुम्हें पता न हो कि शेरो-शायरी या गज़ल लिखे नहीं जाते हैं। ये आपके ज़हन में कभी भी आ जाते हैं। और मेरा मामला थोड़ा अलग है। जब विचारों को प्रवाह होता है तो वे किसी भी रूप में आ सकते हैं। वो चाहे फिर गज़ल हो या शायरी।

मुझे लगता है कि ग़ालिब का अंदाज़ सबसे ज़ुदा है। इसी कारण मुझे नवाबों का संरक्षण मिला। और अब तुम कहते हो कि मैं उन्हीं के ख़िलाफ कलम चलाउं। अगर मैंने उनके शान में कुछ पंक्तियां लिख भी दी तो इसमें ग़लत क्या है??

दर्शन क्या है और जीवन से इसका क्या संबंध है, यह मुझसे बेहतर शायद ही कोई और समझता हो। भाई, तुम किस आधुनिक सोच की बात कर रहे हो? अगर तुम सचमुच दर्शन जानना चाहते हो तो वेदांत और वहदुत-उल-वज़ूद पढ़ो। क्रांति का रट लगाना बंद कर दो। तुम लंदन में रहते हो….मेरा एक काम कर दो। वायसरॉय को मेरे पेंशन के लिए सिफ़ारिश पत्र डाल दो…..।

बहुत थक गया हूं। बस यहीं तक।
तुम्हारा,
ग़ालिब

January 6, 2011

तितलियों का खू़न

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:36 pm

-अंशु मालवीय

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं
कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं
सबक सीखकर,
फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मी पर बहने के लिये है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है….. कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।

January 4, 2011

बीर बिनायक

Filed under: Literature — movementofthought @ 3:22 pm

-मृत्युंजय

[ http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/ से साभार ]

बीर बिनायक बांके दोस्त !
थको नहीं हम संग तुम्हारे
झेल दुखों को जनता के संग
कान्धा भिड़ता रहे हमेशा
यही भरोसा यही भरोसा
बज्र कठिन कमकर का सीना
मज्जा मांस और रकत पसीना
मिलकर चलो जेल से बोलें
जिनकी काटी गयीं जुबानें
उनके मुंह के ताले खोलें

साथी देखो यही राज है
यही काज है
लोकतंत्र का पूर्ण नाश है
लोकसभा और राज सभा
की नूतन अभिनव बक्क वास है
देखो इनके लेखे पूरा
देश एक मैदाने घास है

देशभक्ति का दंगल देखो
रमन सिंह के छत्तीसगढ़ में
चिदंबरम के राज काज में
वेदांता के रामराज में
उगा हुआ है जंगल देखो
नियमगिरी क़ी नरम खाल से
नोच रहे हैं अभरक देखो

देखो बड़ा नमूना देखो
कैसे लगता चूना देखो
भ्रष्ट ज़ज्ज़ और भ्रष्ट कलेक्टर
सबकुछ अन्दर सबकुछ अन्दर
चूस रहे हैं बीच बाज़ार
नंगे नंगे बीच सड़क पर
खुल्लम खुल्ला खोल खालकर
नाच रहे हैं
देशभक्ति का प्रहसन देखो
टेंसन देखो
अनशन देखो

राडिया वाला टेप देख लो
बरखा जी और बीर सांघवी
नई नवेली खेप देख लो
देखो मिस्टर मनमोहन को
जे पी सी अभिनन्दन देखो
ही ही ही ही दांत चियारे
देखो मिस्टर देशभक्त जी
कौन जगह अब पैसा डारें
घूम रहे हैं मारे मारे
कलमाडी क़ी काली हांडी
देखो
अडवाणी क़ी मूंछ देखो
येदुरप्पा क़ी पूँछ देखो
रेड्डी क़ी करतूत देखो
लोकतंत्र के पूत देखो
भूत देखो

पैसा देखो
भैंसा देखो
ऐसा देखो
वैसा देखो
लाइन से सब देशभक्त हैं
इससे पूरा देश त्रस्त है
देखो

नक्सल देखो
डी जी पी के कुशल दांत में लगा हुआ है बक्कल देखो
सलवा जुडूम बनाने वाले
रक्त काण्ड रचवाने वाले
जल जंगल जमीन के भीतर
महानाश रचवाने वाले
देखो नए दलाल देखो
टमाटरी हैं गाल देखो
पी एम सी एम हाउस भीतर
कोर्ट के भीतर कोर्ट के बाहर
हंडिया भीतर
काली काली दाल देखो
देखो रोज़ कमाल देखो

जान बचाने वाले
लाज रखाने वाले
लड़ भिड जाने वाले
सत्य बोलने वाले
देखो
नए नए है देश दुरोहित
नयी नयी परिभाषा देखो
शासन क़ी अभिलाषा देखो
भाषा देखो
जेल देखो
सेल देखो
खनिज लादकर छत्तीसगढ़ से जाने वाली रेल देखो
जनता के अधिकार देखो
ह्त्या का व्यापार देखो

घी में सनी अंगुलियाँ देखो
हीरे क़ी झिन्गुलिया देखो
बड़े चोर का घाव देखो
विपक्षी का ताव देखो
लगे फिटकरी जियें गडकरी
चेहरा देखो संग मरमरी
कांग्रेस के मंतर देखो
बन्दर देखो
अभी अभी बिल से निकला है जनपथ पर छछुन्दर देखो
माल देखो
ताल देखो
डेमोक्रेसी क़ी टटकी टटकी उतरी है यह खाल देखो

ज़ज्ज़ के घर में नेता बैठा नेता घर अखबार
प्रजातंत्र का विकसित होता नव नव कारोबार
बीर बिनायक तुम जैसों से ही बाकी है देश
भिड़ बैठेंगे आयें जितने बदल-बदल कर भेष

January 2, 2011

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:32 pm

[http://www.janjwar.com/ से साभार]

-मुकुल सरल

हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं
ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचें जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

October 22, 2010

Hana’s suitcase

Filed under: Books — movementofthought @ 4:57 pm

पुस्तक परिचय

हाना का सूटकेस [Hana’s suitcase]: बच्चों के लिये एक जरूरी पुस्तक

-स्नेहा

आज के समय में जबकि लगभग सभी देशों की सरकारें अपने को सत्ता में बनाये रखने के लिये साम्प्रदायिकता और समय पड़ने पर फ़ासीवाद का सहारा ले रही है, ‘हाना का सूटकेस‘ [Hana’s suitcase] एक ऐसी पुस्तक है जो पढ़ी जानी चाहिये। वैसे यह पुस्तक बच्चों के लिये है और स्कूलों के पुस्तकालयों में [अगर स्कूल मे यह हो तो!] यह पुस्तक जरूर होनी चाहिये ताकि उनके दिमाग मे जब भी कोई साम्प्रदायिक विचार दूषित करने लगे तो हाना की कहानी उन्हे ऐसा होने से बचा सके।
यह कहानी चेकोस्लोवाकिया के एक यहूदी परिवार के दो बच्चों के बारे में है, जिनका बचपन हिटलर की फ़ासीवादी नीतियों के कारण न सिर्फ़ बुरी तरह रौंद डाला जाता है, बल्कि छोटी सी उम्र में ही कन्सन्ट्रेशन कैम्प मे यातना सहते हुए हाना मारी भी जाती है। जबकि हाना के भाई जार्ज पुस्तक लिखे जाने तक जीवित थे। पुस्तक पढ़ते हुए रोचकता इस कारण और बढ़ जाती है कि जापान में रहने वाले कुछ बच्चे अपनी टीचर के साथ चेकोस्लोवाकिया की इस लड़की के बारे में पता करते है, क्योकि उनके पास एक सूटकेस है जिस पर लिखा है – ‘हाना ब्रेडी, १६ मई १९३१, अनाथ‘। पुस्तक मे जापानी बच्चों की खोज और हाना की कहानी साथ-साथ चलती है।
संक्षेप में पुस्तक की कहानी यह है कि जापान में १९९९ में एक योजना के तहत बच्चों को नाजी जर्मनी में हुए नरसंहार की जानकारी देने के लिये एक संग्रहालय बनाया जाता है, जिसमे उस समय और घटना से जुड़ी वस्तुओं का संग्रह किया जाता है ताकि बच्चे इतिहास की इस जघन्यतम घटना से सबक ले सकें। इसी संग्रहालय में चेकोस्लोवाकिया से एक सूटकेस आता है, जिस पर हाना ब्रेडी का नाम लिखा है। संग्रहालय के बच्चे यह जानने के लिये बेहद उत्सुक हो जाते है कि यह किसका सूटकेस है और इस पर ‘अनाथ‘ क्यों लिखा है। इसी खोज में बच्चे अपनी अध्यापिका फ़ुमिको इशीओका से सम्बन्धित देशों, शहरों और संग्रहालयों को कई पत्र लिखवाते है। इसी बीच फ़ुमिको को यूरोप जाने का मौका मिलता है तो वह लगे हाथ हाना के बारे में छानबीन करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा देती है और वहीं से उसे पता चलता है हाना का एक भाई था जो अभी भी जीवित है और कनाडा मे रहता है। फ़ुमिको जापान लौट कर उसे पत्र लिखती है और हाना की कहानी बच्चों को पता चलती है।
हाना और जार्ज का जीवन आम बच्चों की तरह बेहद मस्ती भरा था, जबतक कि हिटलर की यहूदी विरोध की नस्लीय नीति उनके छोटे से कस्बे को भी अपने कब्जे में नही ले लेती। इस नीति के चलते हाना अपने संगी-साथी, स्कूल, खेल कूद सबसे बिछड़ जाती है। फ़िर एक दिन वह अपनी मां फ़िर अपने पिता से बिछड़ जाती है, क्योकि उन्हे नाजी प्रताड़ना गृह में भेज दिया जाता है। कुछ दिन बाद हाना और जार्ज को भी एक अलग प्रताड़ना गृह में भेज दिया जाता है, जहां दोनों भाई बहन हफ़्ते में एक दिन सिर्फ़ दो घण्टे के लिये मिल पाते है। इस वक्त हाना की उम्र मात्र १३ वर्ष और जार्ज की उम्र मात्र १५ वर्ष थी। कुछ ही दिन बाद जार्ज को अलग कैम्प में भेज दिया जाता है और हाना एकदम अकेली हो जाती है। कुछ दिन बाद उसे भी एक दूसरे कैम्प में भेज दिया जाता है, वहां वह खुश हो कर जाती है कि उसके भाई से मुलाकात होगी पर उसे गैस चैम्बर में बन्द करके मार दिया जाता है।
करेन लेविन द्वारा लिखी गयी यह एक सच्ची कहानी है और पुस्तक में दी गयी हाना और उसके परिवार की तस्वीरें, कन्सन्ट्रेशन कैम्प में हाना द्वारा बनायी गई पेण्टिंग्स इस ७०-८० साल पहले की कहानी को एकदम जीवन्त बना देती है। साथ ही फ़ासीवाद के प्रति नफ़रत भी पैदा करती है।
आज के समय में भारत में, जबकि साम्प्रदायिक फ़ासीवाद शोषक वर्गो का मुख्य हथियार बन गया है, और ऐसे समय में जबकि हिटलर पर एक ऐसी फ़िल्म बनने जा रही है जो उसके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहुलुओं को लोगों के सामने लाने का दावा कर रही है [जिसमे हिटलर की भूमिका पहले अनुपम खेर निभाने वाले थे, पर काफ़ी विरोध के बाद उनके इन्कार करने पर यह भूमिका रघुवीर यादव निभाने जा रहे है], यह पुस्तक हमारी बच्चा पीढ़ी को अवश्य पढ़ानी चाहिये [बड़ो के लिये तो इस विषय पर बहुत सी किताबे और फ़िल्में हैं] ताकि वे नस्लीय राजनीति की साजिश का शिकार होने से बच सकें। यह पुस्तक हिन्दी में अनुदित होकर आये तो यह और भी उपयोगी साबित होगी क्योकि बस यही इसकी खूबियों की सीमा है।

पुस्तक – Hana’s suitcase
लेखक – Karen Levine
प्रकाशक- Jyotsna prakashan, pune
e-mail : jyotsnaprakashan@vsnl.com
वर्ष – 2002 (first indian edition – Dec 2007)
मूल्य – Rs 125

October 17, 2010

पल

Filed under: Literature — movementofthought @ 10:15 am

-किसलय

पल
जो ठिठक कर रुका है
– सहमा सा
देखता है आंखे फ़ाड़े
दूर तक पसरे अंधेरे सन्नाटे
और भूरे आसमान को.
पल
जो ठिठक कर रुका है
सहमा सा
सुन रहा है –
झिंगुरो की आवाजे,
खिड़कियों से रिसती
-ब्रेकिंग न्यूज
रियलिटी शो के हंसी ठठ्ठे
और सूदूर से आती
इंसानी चीखें.
पल
जो निकल पड़ा था
मुंह अंधेरे
ठिठक कर खड़ा है
-चुपचाप
एक पांव हवा में उठाये
टटोलता है अपनी गर्दन से
दसियो दिशायें
खींच रहा है बारीक सूत
हर दिशाओ से.
पल
जो ठिठक कर रुका है
बुन रहा है चुपचाप
– सूदूर भविष्य को
इस निर्मम समय में भी.

September 29, 2010

Touch and Go

Filed under: Article — movementofthought @ 1:38 pm

by Basharat Peer

[Basharat Peer is the author of Curfewed Night. This article was originally published in Open magazine]

On the morning of 16 September, the doctors at New Delhi’s premier Apollo Hospital gave up on their efforts to save Yasir Rafiq Sheikh, a 27-year-old shopkeeper from Maisuma area in Srinagar. In the evening, on hearing of his death, equipped with a curfew pass, I drove with a few journalist friends past hundreds of edgy soldiers, past the coils of barbed wire blocking the desolate roads, to Sheikh’s home near Srinagar’s Lal Chowk.

Yasir was Jammu & Kashmir Liberation Front (JKLF) Chairman Yasin Malik’s cousin, and lived in a house next to his. Malik wore a traditional black kurta pyjama, and his phone rang incessantly. “They are bringing him home tomorrow,” he said on the phone. Malik’s nephew, Ashfaq Jan, a tall, wiry, 18-year-old, who had been with Sheikh when they were shot, joined us. On 30 August, around 10 in the morning, Jan, Sheikh and their friends were playing carom on the street outside their houses. There was no curfew that day, but separatists had issued a call for a hartal (public strike). Some teenagers had gathered in the street and the armed police deployed there were asking them not to step onto the main road, a block away.

Jan and Sheikh kept playing carom. A policeman shouted at them to go back in. “We said we weren’t protesting or pelting stones. We were simply playing carom,” Jan told me. As the policeman continued shouting, another charged at them and fired a pellet gun. “I saw a ball of fire rushing at us. We tried to run, but I was hit and lost consciousness,” said Jan, a class 12 student who is preparing for medical school. Jan was saved, but several pellets remain lodged inside his body, forming small lumps beneath his skin.

The pellet-gun fires small pieces of metal, and scores of pellets had hit Yasir Sheikh in his abdomen and shattered his aorta, the main artery from the heart to the kidneys. “He had lost most of his blood by the time they brought him here,” Dr Mustafa Kamal, one of the doctors manning the injured-filled surgical ward at a major Srinagar hospital, told me. “Around 20 cm of his intestines were cut by pellets and had to be removed. We gave him 20 pints of blood, but the loss of blood led to the collapse of his kidneys,” he said. After ten days, he was moved to Delhi’s Apollo, but couldn’t be saved.

It has been getting harder to keep track of deaths in Kashmir. The current wave of protests against Indian rule grew after the extra-judicial killings of three Kashmiri villagers by the Indian Army in April in Machil sector near Kupwara, and intensified in June after 17-year-old Tufail Mattoo, who was returning home from tuition, was killed by a teargas shell fired by the police trying to disburse young protesters. In the following three months, the police and paramilitary Central Reserve Police Force (CRPF) have already killed 106 Kashmir protesters and bystanders, including children aged 8 and 9. Kashmir’s bottomless rage against the Indian Government and its troops is only growing. Walls all over Kashmir are painted with the slogans: ‘We Want Freedom!’ ‘Go India, Go Back!’

If one had to think of a singular image that has widened the gulf between Kashmir and New Delhi, it is the killing of eight-year-old Sameer Rah in Srinagar’s Batamaloo area on 1 August. On that afternoon, Sameer asked his father, a fruit vendor who was home because of the curfew, for Rs 5 to buy sweets at a corner shop in an inner lane that was open. Fayaz, his father, gave him Rs 2, and the class 2 student rushed out of the house. Sameer, carrying a cricket bat in his hand, had raised some slogans in the street without realising that a group of CRPF men was around. According to eyewitnesses, the men in uniform caught hold of the eight-year-old, beat him up, trampled upon him till he fainted, and then threw him on the road. Of course, the CRPF claims the boy was killed in a stampede. The crowd that gathered to pick up the eight-year-old’s body was tear-gassed. The doctors at SMHS hospital in Srinagar couldn’t save Sameer.

How does one process that? What effect does that have on a people?

To make things worse, J&K Chief Minister Omar Abdullah’s callous government has continued a relentless curfew, which has not even made exceptions for pharmacies and medical laboratories. Hospitals have been facing a serious shortage of medicines and the impossibility of conducting various medical tests that depend on private pharmacies and medical facilities. In the intensive care unit of SMHS hospital, where the eight-year-old Sameer Rah died, Dr Mustafa Kamal and his colleagues spoke of the desperate need for medicines and certain foods. Over the weekend, I spoke to one of Kashmir’s foremost eye surgeons, Dr Bashir Chapoo, who runs a hospital in central Srinagar. Troops hadn’t let him travel to his hospital for more than a week. “I have patients with eye injuries who might lose their sight if I don’t reach them soonest,” Dr Chapoo told me. Seventeen of his patients had pellets fired by the police and troops stuck in their eyes. I called him a few days later. “I am still stuck at home despite two curfew passes. Most of my patients have left the hospital now, and I have no idea where they are and in what condition,” Dr Chapoo told me Tuesday afternoon. “I couldn’t help. I couldn’t reach there. Two have already lost their eyes in my hospital, and that is one small hospital.”

The curfew continues with a few hour breaks once a week. The bustle of Kashmiri mornings has been replaced by an eerie silence. Stray dogs stroll leisurely on our street and the sound of chirping birds dominates the day. The publication of morning papers stopped after the troops beat up the newsagents. Internet and Facebook updates by young Kashmiris, giving details of what they witnessed in their areas, are chilling.

I had a glimpse of the sorrow and anger that is swelling in Kashmir on Friday, 17 September, when Yasir Sheikh’s body was flown back from Delhi for burial. Hundreds of men and women stood in grieving circles outside his house. The men raised loud slogans for freedom from India, but it was the women and girls, dressed mostly in floral printed suits, who articulated the loss. As Sheikh’s body was brought out in a wooden coffin, the women sang the songs they traditionally sing for a groom when he leaves to get his bride. The lyrics, sung in Kashmiri, praised the slain boy’s beauty and youth. “Raju morukh begunaah!” (An innocent Raju was murdered!) went the refrain. Raju was Yasir Sheikh’s nickname. As the pallbearers moved past the spot where he had played his last game of carom, a thousand tears dropped. His distraught old father followed, showering him with almonds and confectionery.

Kashmir has seen this moment thousands of times earlier. I walked away wondering: how much sorrow can a people bear? How many more deaths will it take for Delhi to come up with a significant political response?

The Cabinet Committee on Security and All Party meetings in Delhi last week had only added to the disappointment in Kashmir, since even moderate demands like revoking or repealing the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) were rejected—despite recommendations of a committee set up in 2006 by the PM himself that these laws ‘should be reviewed and revoked’ because they ‘impinge on fundamental rights of citizens and adversely affect the public’. Scaling back troops from residential areas wasn’t even discussed, but a delegation of MPs was sent to Kashmir to assess the scene.

Kashmir has been a world away from the hopeful spring of 2007, when back-channel talks between Indian and Pakistani diplomats, encouraged by Pervez Musharraf and Manmohan Singh, came close to an agreement on a largely autonomous Kashmir with soft borders between the Indian and Pakistan controlled parts, followed by demilitarisation of the region. “It was supposed to be an interim arrangement for the next five or ten years, and then the people of Kashmir, India and Pakistan could take a call and move towards a final arrangement,” Mirwaiz Umer Farooq told me.

But Musharraf lost power, talks lost steam and then broke down after the 26/11 Mumbai attacks of 2008. Moderates like Farooq, who championed peace talks without any results, found themselves marginalised in Kashmir. The popularity of the 81-year-old separatist hardliner Syed Ali Shah Geelani has soared, and the only lull in the protests in the past few months occurred when he appealed to protesters last month to desist.

On 20 September morning, when the MPs were about to fly to Kashmir, while the Army and police guarded the road from Srinagar airport to the city, the state government got municipal workers to whitewash the separatist graffiti on the walls and houses along the way. The visit was turning out to be of little consequence, as Kashmir remained under lockdown and they met a carefully chosen few at a much-guarded conference centre on the outskirts of Srinagar.

But things can change in a moment. That afternoon, five MPs led by the CPM’s Sitaram Yechury showed up at Geelani’s Srinagar home. Two other groups met Mirwaiz Umer Farooq and Yasin Malik. Geelani had set five preconditions for peace talks with India: New Delhi should accept Kashmir as a dispute, set political prisoners free, demilitarise the region, punish the troops guilty of civilian killings, and withdraw controversial laws like the AFSPA. “If the Centre responds positively to these demands, we will review the ongoing agitation in the state and renew the engagement. If there is no response, then we will have no option but to continue our struggle,” Geelani told the delegation in front of TV cameras that he had insisted on. “We will take up the five points with the Government of India,” said Yechury.

The meeting is being seen in Kashmir as an acknowledgement of the troubles and need to begin a conversation. Soon after the meeting with Geelani ended, I walked a few miles from my south Srinagar home to Lal Chowk to the newspaper offices complex. The roads remained blocked with coils of barbed wire, and on producing a journalist’s identity card and requesting the CRPF men to let me proceed, I found myself answering questions they had about the delegation. “Has anything happened?” I was asked at every checkpoint. I repeated the story about Geelani’s meeting with Yechury and others. “Arre yeh toh badhiya khabar hai. Geelani baatcheet karega, tabhi yahaan kuchh ho sakta hai,” one said. “Phir toh shaayad kal parrson se shanti ho sakti hai,” another hoped. They too seemed tired and hoping for a serious conversation to begin that would lead us out of this unending siege.

Imran Bhat, a college student, is one of the best known stone-pelters of Srinagar. He sees the visit as achieving something only if some of Geelani’s demands are conceded: “It is good they have talked to Geelani, but they need to follow this up with some concrete steps. They must act on some of the demands he placed before them. For one, they must release the hundreds of political prisoners imprisoned under the Public Security Act. Otherwise, we will be back on the streets.” Back? In actual fact, even as the delegation spoke to politicians in Srinagar, there was a fresh bout of stone-pelting downtown.

Under such circumstances, what Manmohan Singh’s Government does next on Kashmir will be its big test. In Delhi, the BJP has already distanced itself from the decision by members of the All Party Delegation to engage with separatist leaders. With little more than a month left for the much-coveted visit of US President Barack Obama, it will take political courage for Delhi to offer what has been suggested among others by the People Democratic Party’s Mehbooba Mufti: unconditional talks. That could open some space not just for Geelani but for moderates as well to become part of the peace process. It may well be the only way to save Kashmir—and India itself—from future calamities.

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August 15, 2010

सुबह का रंग भूरा

Filed under: Literature — movementofthought @ 12:00 pm

[ The one thing which fascism can’t tolerate is diversity. Fascism always impose one culture, one language, one thought, one view and one choice.
In this story, writer has beautifully described this character of fascism. This story shows how fascism ultimately invades each and every walk of our life if we don’t resist it.
This story was first published in France in 1998 and till then more that 500,000 copies has been sold. It has also been translated into several languages. This story was published in Samayantar magazine in June 2010. -Editor ]

जून 2010 के समयान्तर से साभार

-फ्रांक पावलोफ

चार्ली और मैं धूप में बैठे थे। हम दोनो में से कोई ज्यादा बात नहीं कर रहा था। बस दिमाग में आ रहे ऊल जूलूल खयालों के बारे में परस्पर बतिया रहे थे। ईमानदारी से कहूं तो मैं उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। हम काफी की चुस्कियां ले रहे थे और समय सुखद गति से व्यतीत हो रहा था। हम दुनिया की गतिशीलता को निहार रहे थे। वह मुझे अपने कुत्ते के बारे में कुछ बता रहा था। किसी इन्जेक्शन के बारे में जो उसे कुत्ते को देना पड़ा था। लेकिन तब भी मैने वाकई ज्यादा गौर नहीं किया था।
बेचारे जानवर की तकलीफ दुखद थी। हालांकि ईमानदारी से कहें तो उसकी उम्र 15 साल थी, जो कुत्ते के लिए एक भरी पुरी आयु है। इस लिए तुमने सोचा था कि वह इस बात से वाकिफ है कि कुत्ते को किसी दिन जाना ही है।
‘‘देखो’’, चार्ली ने कहा ‘‘ मैं उसे भूरे रंग का तो नहीं बता सकता था।’’
‘‘हां जाहिर है। वह आखिर एक लेबराडोर था, वह काला लेबराडोर ही तो था न? खैर छोड़ो, उसे हुआ क्या था?’’
‘‘कुछ भी नहीं। बस यही कि वह भूरा कुत्ता नहीं था। बस इतना ही।’
‘‘क्या? तो अब उन्होने भी कुत्तों पर भी शुरू कर दिया।’’
‘‘हां’’’
पिछले महीने बिल्लियों के साथ ऐसा हुआ था। मैं बिल्लियों के बारे में जानता था। मेरे पास भी एक थी। एक आवारा बिल्ली जिसे मैने पाला था। काले और सफेद रंग की एक नन्हीं गन्दी सी बिल्ली। मैं उसे पसंद करता था। लेकिन मुझे उससे छुटकारा लेना पड़ा।
मेरे कहने का मतलब है कि उनके पास भी तर्क है। बिल्लियों की आबादी बेकाबू हो रही थी और जैसा कि सरकारी वैज्ञानिक कह रहे थे कि मुख्य चीज़ है भूरी बिल्लियों को ही पालना। ताजा प्रयोगों के मुताबिक भूरे पालतू जानवर दूसरों के मुकाबले हमारी आधुनिक शहरी ज़िन्दगी के लिहाज से ज्यादा अनुकूल हैं। वे कम गन्दगी करते हैं और खाते भी बहुत कम हैं। किसी भी हालत में, बिल्ली आखिर बिल्ली है और भूरे रंग से इतर रंग वाली बिल्लियों से छुटकारा पाकर एक बार में ही समस्या का निदान कर लेना समझदारी की बात है।
सैन्य पुलिस आरसेनिक की गोलियां मुत दे रही थी। आपको करना ये होता था कि उनके खाने में गोलियां मिला दो और कहानी खत्म। एक बारगी मेरा दिल टूट गया। लेकिन मैं जल्द ही इससे उबर गया।
मुझे यह बात मान लेनी चाहिए कि कुत्तों की खबर ने मुझे थोड़ा सा झिंझोड़ दिया था। मुझे नहीं पता था कि क्यो। खासकर शायद इस लिए कि वे अपेक्षाकृत बड़े होते हैं या शायद इस लिए कि वे मनुष्य के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं जैसा कि कहा जाता है।
खैर, चार्ली ने इस मामले में कदम बढ़ा ही दिये थे। और यह सही भी था।
आखिरकार इन चीजों के बारे में ज्यादा ही माथा पच्ची करने से कुछ होना हवाना नहीं था। और जहां तक बुरे कुत्तों की बात है कि वे औरों से बेहतर हैं, मैं समझता हूं कि यह बात सही ही होगी।
हम दोनों के बीच ज्यादा कुछ बात करने लायक नहीं बचा तो थोड़ी देर बाद हमने अपनी अपनी राय ली।
लेकिन दिमाग के कोने में मुझे लग रहा था कि कुछ अनकहा रह गया है। बाकी का दिन इसी संदेह के साये में गुजरा।
इस घटना को बीते ज्यादा दिन भी नहीं हुए कि चार्ली को ब्रेकिंग न्यूज़ देने की मेरी बारी आ गयी। मैने उसे बताया कि ‘‘डेली अब कभी नहीं छपेगा’’
द डेली, जिसे वह काफी पीते हुए हर सुबह पढ़ता था।
‘‘तुम कहना क्या चाहते हो? क्या वे हड़ताल पर हैं? क्या वे दीवालिया हो गए हैं या कुछ और?’’
‘‘नहीं, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका सम्बन्ध कुत्तों वाले मामले से है।’’
‘‘क्या भूरे वाले?’’
‘‘बिल्कुल सही। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब उन्होंने उस नए कानून के बारे में बात न की हो। बात यहां तक आ पहुंची कि उन्होने वैज्ञानिक तथ्यों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिये थे। मेरे कहने का मतलब ये कि पाठको को पता ही नहीं था कि वे और क्या सोचें। उनमें से कुछ ने अपने कुत्ते छिपाने शुरू कर दिये थे।’’
‘‘लेकिन यह तो संकट को बुलावा है।’’
‘‘हां , बिल्कुल, और इसलिए अब अखबार पर पाबन्दी लगा दी गयी है।’’
‘‘तुम मजाक कर रहे हो। रेसिंग क्या होगा।’’
‘‘हूं, मेरे पुराने दोस्त तुम्हे तो उस बारे में टिप्स आने वाले दिनों में ब्राउन न्यूज से लेनी शुरू करनी होगी। नहीं लोगे क्या। और कुछ भी नहीं है यहां। खैर घुड़दौड़ का उनका सेक्शन ऊपरी तौर पर बुरा नहीं है।’’
‘‘दूसरे बहुत आगे निकल गए। लेकिन आखिरकार तुम्हे किसी तरह का अखबार तो मिल ही रहा है। यानी क्या चल रहा है यह जानने का तुम्हारे पास कोई जरिया तो रहेगा ही। क्यो।’’
मैं चला था कि चार्ली के साथ इत्मीनान से काफी पियूंगा। और यहां मैं ब्राउन न्यूज का एक पाठक बनने की चर्चा में ही उलझा हुआ था। कैफे में मेरे आसपास बैठे और लोग अपने में व्यस्त थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं जाहिरा तौर पर खामख्वाह हलकान हुए जा रहा था।
उसके बाद बारी थी लाइब्रेरी की किताबों की। इस बारे में कुछ ऐसा था जो सही नहीं था। ‘द डेली’ सरीखे संगठनों से जुड़े प्रकाशन संस्थानों को अदालत में घसीटा गया था और उनकी किताबें, पुस्तकालयों और किताब की दुकानों से हटा ली गयी थीं। लेकिन फिर दोबारा उनकी प्रकाशित हर चीज़ में कुत्ता या बिल्ली शब्दों का उल्लेख होता महसूस होता था। हमेशा ‘भूरे’ शब्द के साथ न भी हो तब भी। तो उनकी मंशा जाहिर थी।
‘‘यह तो बिल्कुल बुड़बक वाली बात है’’, चार्ली ने कहा।
‘‘कानून, कानून है। उसके साथ चूहे बिल्ली का खेल करने का कोई मतलब नहीं है।’’
‘भूरा’, उसने जोड़ा, अपने आसपास देखते हुए कि कहीं कोई हमारी बातचीत सुन तो नहीं रहा था। ‘भूरा चूहा’।
सुरक्षा के लिहाज से हमने वाक्यांशों, या दूसरे खास शब्दों के पीछे भूरा जोड़ना शुरू कर दिया था। हम ब्राउन पेस्ट्री के बारे मे दरियात करते। शुरू में यह थोड़ा अटपटा लगा। लेकिन स्लैंग तो यूं भी हमेशा बदलता रहा है, इसलिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम अपनी बात के आखिर में ‘भूरा’ जोड़ें या कहें भाड़ में जाओ। जो कि हम आम तौर पर कहते ही थे। कम से कम इस तरह हमने कोई मुसीबत मोल नहीं ली थी और यही तरीका हमें अच्छा लगता था।
यहां तक कि हमें घोड़ों पर भी जीत नसीब हुयी। मेरा मतलब, ये कोई जैक पाट या और कुछ नहीं था। लेकिन ये थी तो जीत ही। हमारी पहली भूरी विजय। और इस तरह बाकी हर चीज़ ओके लगने लगी।
चार्ली के साथ बिताया एक दिन मैं हमेशा याद रखूंगा। मैने उसे कप का फाइनल देखने के लिए अपने घर बुलाया था। और जैसे ही एक दूसरे से मिले, हम हस पड़े। उसने नया कुत्ता लिया था। वह एक भारी जानवर था। पूंछ की नोक से लेकर थूथन तक भूरा का भूरा। उसकी आंखें भी भूरी थी।
‘‘है न ग़जब का, ये मेरे पुराने कुत्ते से ज्यादा दोस्ती वाला है। ज्यादा स्वामिभक्त भी। मैं भी उस काले लेबराडोर के बारे में क्या बातें लेकर बैठ गया था।’’
जैसे ही उसने यह कहा उसके नए कुत्ते ने सोफे के नीचे डाइव मारी और भौंकना शुरू कर दिया। और हर भूंक में मानो वह कहता था, ‘‘मैं भूरा हूं, मैं भूरा हूं और कोई मुझे नहीं बताता था कि मुझे क्या करना है।’’
हमने उसे हैरत से देखा। और तभी सिक्का गिरा।
‘‘तुम भी’’ चार्ली ने कहा।
‘‘मैं डर गया हूं।’’
आप देखिए उसी वक्त मेरी नयी बिल्ली कमरे में कूदी और अल्मारी के ऊपर छिपने के लिए पर्दे पर जा चढ़ी। भूरे फर वाली बिल्ली। और वे भूरी आंखें जो लगता था, आप जहां जहां जाते है, वे आपका पीछा करती रहती हैं। और इसलिए हम दोनो हस पड़े थे। संयोग के भी क्या कहने।
‘‘मैं भी बिल्ली वाला आदमी हूं वैसे। देखो कितनी प्यारी है। है न?’’
‘‘सुन्दर’’, उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा। फिर हम टीवी की ओर मुखातिब हुए। हमारे दोनो भूरे जानवर अपनी आंखों के कोनों से एक दूसरे को होशियारी से घूर रहे थे।
मैं आपको नहीं बता सकता कि इतना सब होने के बाद आखिर उस दिन फाइनल किसने जीता। मैं उस दिन को वास्तविक हंसी के दिन की तरह याद रखता हूं। हमने वाकई महसूस किया कि शहर भर में जो बदलाव किये जा रहे थे उनके बारे में आखिरकार चिन्तित होने की कोई वजह नहीं थी मतलब आप वही करते थे जो आपसे अपेक्षित था और आप सुरक्षित थे। शायद नए निर्देशों ने हरेक की ज़िन्दगी आसान बना दी थी।
जाहिर है, मैने उस छोटे बच्चे को भी अपने खयालों में जगह दी थी जो उस दिन सुबह मुझे दिखा था। वह सड़क के दूसरे किनारे पर घुटनों के बल बैठा रो रहा था। उसके सामने जमीन पर एक नन्हा सा सफेद कुत्ता मरा पड़ा था। मैं जानता था कि वह जल्द ही इस हादसे से उबर जाएगा। आखिरकार ऐसा नहीं था कि कुत्तों की मनाही कर दी गयी थी। उसे करना यह था कि भूरा कुत्ता लाना चाहिए था। आपको ठीक वैसा ही गोद मे खिलाया जाने वाला पूडल मिल सकता था, जो वहां उस बच्चे के पास था। तब वह भी हमारी तरह होता। यह जानकर अच्छा लगता है कि आप कानून का सही पालन करते हैं।
और फिर कल, ठीक ऐसे वक्त जब मुझे लगता था कि सब कुछ सही है, मैं बाल बाल बचा वरना सेना पुलिस ने धर लिया होता। भूरी पोशाक वाले लोग। वे कभी आपको यूं ही नहीं जाने देते। खुशकिस्मती से उन्होने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि वे इलाके में नए थे। और हर किसी को अभी नहीं जानते थे। मैं चार्ली के घर जा रहा था। इतवार का दिन था। और मैं उसके घर ताश खेलने जा रहा था। मैं अपने साथ बीयर की कुछ बोतलें भी ले जा रहा था। आपको ताश के मजेदार खेल तो जब तब खेलते ही रहने होंगे। मेज पर ताल बजाते हुए और कुछ चना चबैना करते हुए एक दो घण्टे बिताने की बात थी।
जैसे ही मैं सीढ़ियों पर चढ़ा मुझे अपनी ज़िन्दगी का पहला धक्का लगा। उसके घर का दरवाजा खुला पड़ा था। और सेना पुलिस के दो अफसर दरवाजे के सामने खड़े थे। वे लोगों से चलते रहने को कह रहे थे। मैने ऐसे जाहिर किया जैसे मैं ऊपर की मंजिल के लैट में जा रहा हूं और सीढ़ियों पर चढ़ गया। ऊपर से मैं लिट से नीचे उतर आया। बाहर सड़क पर फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं।
लेकिन उसके पास तो भूरा कुत्ता है। हम सबने देखा है।
ठीक है, हां, लेकिन वे कह रहे हैं कि पहले तो उसके पास काला था।
‘‘पहले’’?
‘‘हां, पहले। आपके पास पहले से ही कोई भूरा कुत्ता न होना भी अब एक जुर्म है। और इस बात की जानकारी मिलना मुश्किल नहीं है। वे कुछ नहीं करेंगे सिर्फ पड़ोसियों से पूछ लेंगे।’’
मैं फौरन चला आया। मेरी गर्दन के पीछे पसीने ठंडी धार रेंगती हुयी गयी।
अगर पहले आपके पास किसी और रंग का जानवर होना अपराध है तो सेना पुलिस किसी भी वक्त मेरे पीछे भी लग जाएगी। मेरे ब्लाक में सब जानते थे कि पहले मेरे पास काली-सफेद बिल्ली थी। पहले! मैने इस बारे में तो कभी नहीं सोचा था।
आज सुबह, ब्राउन रेडियो ने समाचार की पुष्टि कर दी। गिरतार किये गए पांच सौ लोगों में चार्ली भी था। अधिकारियों का कहना था कि भले उन लोगों ने हाल में भूरा जानवर खरीद लिया हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं था कि उन्होने वास्तव में अपने सोचने का तरीका भी बदल दिया हो।
‘‘किसी पुराने समय में ऐसे कुत्ते या बिल्ली का स्वामी होना जो समरूप नहीं है, एक अपराध है’’, उद्घोषक ने ऐलान किया। फिर उसने जोड़ा – ‘‘ यह राज्य के विरुद्ध अपराध है’’।
उसके बाद जो हुआ वह और भी बुंरा था। अगर आपने खुद कभी कुत्ते या बिल्ली न रखें हों लेकिन अगर आपके परिवार में किसी ने -आपके पिता या भाई या रिश्तेदार ने अपनी जिन्दगी में कभी भी ऐसे कुत्ते बिल्ली पालें हों जो भूरे न रहें हों तो ऐसी स्थितियों में भी आप दोषी हैं। आप हर हाल में दोषी हैं।
मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने चार्ली के साथ क्या किया।
यह पूरा मामला हाथ से निकल रहा था। दुनिया बौरा गयी थी। और मैं, भलामानुस सोच रहा था कि मैं अपनी नयी भूरी बिल्ली के साथ सुरक्षित हूं।
जाहिर है, अगर वे पहले पाले गए जानवर के रंग को आधार बनाएं तो जिसे चाहें उसे गिरतार कर सकते हैं।
मैं उस रात पलक तक नहीं झपका सका। मुझे शुरू से ही ‘ब्राउन्स’ पर संदेह होना चाहिए था। जानवरों के बारे में उनका पहला कानून। मुझे उस समय कुछ कहना चाहिए था। आखिरकार, वह मेरी बिल्ली थी। और कुत्ता चार्ली का था। हमें सिर्फ यह कहना चाहिए था-नहीं। उनके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन हम क्या कर सकते थे? मतलब, सबकुछ इतनी तेजी से हुआ। और फिर कामकाज भी था और दुनिया भर की दूसरी चिन्ताएं। और यूं भी हम कोई अकेले तो थे नहीं। हर किसी ने ऐसा किया था। अपने सिर झुकाए रखे। हम महज थोड़ी सी शान्ति और तसल्ली चाहते थे।
कोई दरवाजा खटखटा रहा है। यह तो सुबह का वक्त है। बहुत सुबह। इस समय तो कोई राउण्ड पर नहीं आता। अभी तो उजाला भी नहीं फूटा है। अभी तो सुबह का रंग भूरा है।
जोर जोर से दरवाजा पीटना बन्द करो। मैं आ रहा हूं…………………..।

प्रस्तुति और अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

June 16, 2010

हरियाली के आखेटक

Filed under: Literature — movementofthought @ 6:11 pm

[पाखी पत्रिका (जून २०१० अंक) से साभार]

-अंशु मालवीय

अब चल पड़ी है बस्तर में कहावत एक
कि जैसे-
पावर प्लांट वालों के घर बच्चे पैदा होते हैं
पावर के साथ,
स्टील प्लांट वालों के द्घर बच्चे पैदा होते हैं,
लोहे के दाँतों के साथ,

मुरिया गोंड के घर बच्चे पैदा होते हैं,
अपनी धरती अपने साथ लेकर!
नाभि-नाल से जुड़ी, एक अदद अपनी
गर्भ-द्रव में सनी लथपथ हरियाली धरती…
जनम के समय, पुरखों की छाती का नगाड़ा
पैरों से बजाता-नाचता है गाँव-आसमान से चूती है
चाँदनी महुए सी,
नन्हें बच्चों की लार में बहती है नमी वीरान जंगलों की
दण्डकारण्य के सन्नाटे में शोर मचाता चित्रकूट का झरना फूटता है
उनकी किलकारियों में,
साल के पुराने वृक्ष उनके पैरों की नसों में उतरते
धंसते चले जाते हैं, पानी की तलाश में चट्टानों को तोड़ते
जड़ें फैलती जाती हैं
पुकारती मिट्टी के भीतर… ‘इन्द्रावती-इन्द्रावती’…
इन्द्रावती की लहरों के पालने में झूलते हैं दिग-दिगंत
नीले वितान तले हरे… बहुत हरे… गाढ़े काही स्वप्न!
फैलती हैं साल की जड़ें-बॉक्साइट की सहलाती
कोयले से लिपटती, लोहे को पुचकारती
फैलती जाती हैं जड़ें नियामगिरी से बैलाडीला तक
पारादीप से झरिया तक धरती में रक्त का प्रवाह लेकर
भागती, अति नवीन पुरातन जड़ें
धरती की निद्रा में स्वप्न रेशों सी फैलती जड़ें
दामोदर के पेट की आग लेकर कोयलकारो में बुझाती
इन्द्रावती में तैरती काइयों के शव
सुवर्णरेखा के जहरीले पानी में बहाती
फैलती जाती हैं जड़ें निर्भीक, उदास और उजड्ड जड़ें।
मादल की थाप पर उड़ती है चील एक विकल बदहवास
आसमान के गुम्बद में लेकर उड़ती है कोयले का चाँद
और मारती है टिहकारी
…टिहकारी से गिरती है बिजली
जन्मजात विकृत बच्चों की एक पाठशाला पर
पाठशाला पर लिखा है… रेडियोएक्टिव शिक्षा के केंद्र
जा… दू… गो… ड़ा… में आपका स्वागत है।
वहाँ से दूर संथाल परगना के किसी जंगल में
अपने टूटे हुए धनुष से पथरीली जमीन को कुरेदते
तिल्का माँझी की आँख से रक्त के सोते फूटते हैं…
बुदबुदाता है अकेला बैठा… सुनो… सुनो
शोर है बहुत, कैटरपिलर का शोर ऊँचा होता जा रहा है
सुनो शोर है बहुत… बारूद का, ट्रकों का, सरकारी गाड़ियों का
कोयले की गर्द आसमान की आँखों में पैठती जाती है
तिल्का माँझी बुदबुदाता है…
क्या बोलता है अपने टूटे हुए धनुष से कुरेदते हुए पथरीली जमीन
बुदबुदाता है- धरती… धरती… धरती…!
धरती… धरती… धरती…!
‘धरती के हम मालिक नहीं… हम रखवाले हैं।
सौंपनी है धरती हमें अपनी वाली पीढ़ी को… कैसी धरती?’
अपने घावों का मुँह बंद करती काली-लाल मिट्टी से
हवा भागती है-
जंगल दर जंगल, पहाड़ दर पहाड़
गाँव से शहर-शहर से झोपड़पट्टियों तक
अल्मुनियम का कटोरा थामे… उसी अल्मुनियम का
जिसके लिए बॉक्साइट की खदानों को अपना यौवन दिया था उसने
उत्पादक-मजदूर-भिखारन हवा
उसी लोहे की बेड़ियाँ पहने, जिसकी खानों में उड़ती गर्द ने
उसके फेफड़ों में घोसला बनाया… है, खाँसती, खामोश हवा।
कहानी सुनाती है हवा, जले हुए वृक्षों के आधे धड़ों को-
‘बहुत-बहुत’ समय पहले की बात हैऋ इस जंगल में
एक राष्ट्र, राज करता था-
उसने नदियों को बोतलों में बंद किया
-उसने वृक्षों को गमलों में कैद किया
-उसने जमीन का लोहा खींचा
-और उससे पलंग बनाकर सो गया
ये खदानों के विस्फोट नहीं राष्ट्र के खर्राटे हैं
ये बाँधों में लहरों के थपेड़े नहीं राष्ट्र की करवटें हैं
जिसके नीचे कुचल जाती हैं
सभ्यताएँ
भाषाएँ
ज्ञान
और संस्कृतियाँ…।
उसके राज में रोटियाँ, चिमटों की गुलाम थीं
साहित्य चुगली के काम आता था
इतिहास बलि माँगता था
और विज्ञान- सामूहिक नरसंहारों की मनोरंजक फ़िल्में बनाता था।
…कहानी की लय टूटती है…
भौंकते आते हैं ‘ग्रे हाउण्ड’ मिथ्या शहादत की राष्ट्रीय दुम हिलाते
उनके बूटों से चरमराते हैं पत्ते, बच्चों की पसलियों जैसे
उनके पीछे आते हैं अर्थशास्त्री ग्रोथ रेट का नगाड़ा पीटते
उनके पीछे आते हैं उद्योगपति-ठेकेदार-माफ़िया विकास का गंडासा लिए
उनके पीछे आते हैं मंतरी-संतरी, दलाल-अफसर
संगीनों पर लटके सहमति पत्र लिए
फ़िर आता है कैमरे, कपड़े और आँकड़े चमकाता मीडिया
अंत में आती है हरियाली… हमेशा की तरह विनम्र और महान
गरदन उतारे जाने के ठीक पहले
अपनी गरिमामय मृत्यु को निहारती है स्नेह से
और नजर डालती है पूरे अमले पर
बोलती है
ठीक वैसी ही आवाज में जैसे सावन-भादो की स्याह रातों को
उमड़ते हुए बादल बोलते हैं-
‘बड़े-बड़े प्रतापी राजा चले गये
धर्मराज युधिष्ठिर भी गये खाली हाथ
ये धरती किसी के साथ नहीं गई
हे राजन!
ये तुम्हारे साथ भी नहीं जाएगी।’

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