Movement of thought

March 28, 2010

Terror incognito

Filed under: Books — movementofthought @ 2:31 pm

In 2006, Amitava Kumar went to Walavati, south of Mumbai, to report the case of an accused terrorist, Iqbal Haspatel, whom he later wrote about in Time Out. Kumar, a writer who teaches English at Vassar College, had already explored the dark world of Islamophobia in Husband of a Fanatic, prompted by his marriage to a Pakistani Muslim. In his new book, Evidence of Suspicion, he goes a step further in asking why we hate the people we hate, in this case, men accused of terrorism. “Terror is the new fetish,” he told Raghu Karnad. “Its meaning is taken for granted.”

Before you wrote the Haspatel story, you obviously already had strong feelings about the way India prosecutes terrorism.

I decided to go to Walavati and meet the Haspatels because a piece of textile machinery – a bobbin – found in their living room had been mistaken for a projectile. They were tortured for days because the police had made a malicious mistake.
But before that, I had been working on another story, also about terrorism, but in the US. It was the story of Hemant Lakhani, a used-clothing salesman convicted of selling a missile to the FBI. Both illustrated the problems of the war on terror: the state’s desperation to find villains, its ability to produce only victims.

In India there’s a stigma against reporting the fate of terror accused. What is the power of the phrase, “He is a terrorist”?

The punitive state – but also a public guided by the often jingoistic media – can be only a few inches removed from the mentality of a lynch mob. Is everyone innocent? No. SAR Geelani told me that when he ran into one of his torturers, the cop apologised for what they did to him, but wanted Geelani to understand that not everyone was innocent. No, said Geelani, but 95 per cent are.
I’m not here to attribute innocence or culpability. I’m only trying to show how we can’t proceed with identikit images. This book is a writer’s search for particularity and detail.

This is as much a book about torture as it is about terror. What’s the relationship between terror and torture?

Each one of us has received an education in the art of torture in recent years. That’s America’s gift to us, through this war on terror, that we’ve learned words like “waterboarding”. We have also learned that torture isn’t only about force: men lose their minds, not when beaten to within an inch of their lives, but when they are placed in solitary confinement with black-out goggles and noise-blocking headphones wrapped around their heads. We have learned that if terror by non-state actors relies on brutal killing of innocents, then state terror proceeds by making torture justifiable and routine.
2008 was an unsettling year for those trying to understand terror. The courts’ refusal to extend a ban on SIMI, the discovery of Hindu terror networks – there was all this dissonance in the terrorism narrative. Then 26/11 happened. Did it kill an opportunity for more critical thinking?

You’re right. Kasab and his cohort killed all the questions that we were asking about the ways in which Indian authorities had been investigating terror.
The Mumbai attacks hurt more than just those few hundred people. As we saw with 9/11, a blatant attack, spectacularly staged, can become the excuse for unremitting war. Will the trauma of 26/11 allow us to be sceptical of the state’s claims? Most people will say, and rightly so, “What proof do you need? Didn’t you see the Taj on fire?” The attacks have formed something like the primal memory of life in the age of terror. That memory will keep making the nightmare real.


March 16, 2010

हरी दूबें

Filed under: Literature — movementofthought @ 3:37 pm


बन्जर धरती की फटती दरारों से
लहराती है नन्ही दूबें
अपने छोटे हाथो को आसमान की तरफ़ उठाये
मानो छू लेना चाहती हों – नीले आसमान को .
सालो हुए सुनायी नही पड़े थे
– पछियों के गीत
जानें कहा उड़ चले थे सभी.
अब तो नंगी ठूठों पर कब्जा है – गिद्धों का
भयावह शान्ती से देखते हैं वें
-मीलो फैली बन्जर, पथरीली धरती को.
दरारों से निकलती नन्ही दूबें
बुलाती हैं – उन पछियों को
जो भटक कर दूर निकल गये थे कहीं
बुलाती हैं – बिखरे हुए बादलों के टुकड़ों को
भटकते थे तन्हा जो सुदूर आसमां में.
भयावह खतरा है हमारी नंगी ठूठों
और बन्जर जमीनों को – इन दूबों से
-चीखते हैं गिद्ध !!
फ़ैलाते है अपने विशालकाय डैने
उगलते है आग अपनी ख़ूनी निगाहों से
इन नन्ही दूबों पर !
लहराती हैं नन्ही दूबें
बुलाती हैं – पछियों, बादलों और हवाओं को.
शायद फ़ूटनें वाली हैं नन्ही कोपलें
गिद्धों के पावों तले – नंगी ठूठों पर.

March 13, 2010

सलाखो के पीछे कैद स्वाधीनता

Filed under: Politics — movementofthought @ 7:17 am

[This article was originally published on ]


इरादा तो आज था कि अभय ने अपने ब्लौग– निर्मल आनन्द– में जो सवाल उठाया है : हिन्दी में सितारा कौन है ? — उस पर कुछ विचार किया जाये, लेकिन आज एक ऐसी बात हुई कि आप से किसी और विषय की चर्चा करने को मन हो आया है.
आज हमारी युवा मित्र सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय की १४ दिन की रिमाण्ड की अवधि पूरी हो रही थी और उन्हें पुलिस फिर से रिमाण्ड में लेने के लिये अदालत में पेश करने नैनी जैल से लाने वाली थी. बात को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि सीमा आज़ाद मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. से सम्बद्ध हैं, साथ ही द्वैमासिक पत्रिका “दस्तक” की सम्पादक हैं और उनके पति विश्वविजय वामपन्थी रुझान वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अपनी पत्रिका “दस्तक” में सीमा लगातार मौजूदा जनविरोधी सरकार की मुखर आलोचना करती रही है. सीमा ने पत्रिका का सम्पादन करने के साथ-साथ सरकार के बहुत-से क़दमों का कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं. इनमें गंगा एक्सप्रेस-वे, कानपुर के कपड़ा उद्योग और नौगढ़ में पुलिसिया दमन से सम्बन्धित पुस्तिकाएं बहुत चर्चित रही हैं. हाल ही में, १९ जनवरी को सीमा ने गृह मन्त्री पी चिदम्बरम के कुख्यात “औपरेशन ग्रीनहण्ट” के खिलाफ़ लेखों का एक संग्रह प्रकाशित किया. ज़ाहिर है, इन सारी वजहों से सरकार की नज़र सीमा पर थी और ६ तारीख़ को पुलिस ने सीमा और विश्वविजय को गिरफ़्तार कर लिया और जैसा कि दसियों मामलों में देखा गया है उनसे झूठी बरामदगियां दिखा कर उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा दिया.
वैसे यह कोई नयी बात नहीं है. जनविरोधी सरकारें सदा से यही करती आयी हैं. हाल के दिनों में मौजूदा सत्ताधारी कौंग्रेस ने जिस तरह देश को बड़े पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों गिरवी रखने के लिये क़रार किये हैं और कलिंगनगर, सिंगुर, नन्दीग्राम, लालगढ़, और बस्तर और झारखण्ड के आदिवासियों को बेदखल करना शुरू किया है, वह किसी भी तरह की आलोचना को सहन करने के मूड में नहीं है. और इसीलिये हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र को लम्बा अवकाश दे कर अपनी नीतियों के विरोधियों को कभी “आतंकवादी” और कभी “नक्सलवादी” या “माओवादी” घोषित करके जेल की सलाखों के पीछे ठूंसने का वही फ़र्रुख़ाबादी खेल खेलने लगी है. इस खेल में सब कुछ जायज़ है — हर तरह का झूठ, हर तरह का फ़रेब और हर तरह का दमन. और इस फ़रेब में सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है हमारा बिका हुआ मीडिया. इसीलिए हैरत नहीं हुई कि सीमा की गिरफ़्तारी के बाद अख़बारों ने हर तरह की अतिरंजित सनसनीख़ेज़ ख़बरें छापीं कि ट्रक भर कर नक्सलवादी साहित्य बरामद हुआ है, कि सीमा माओवादियों की “डेनकीपर” (आश्रयदाता) थी और विश्वविजय माओवादियों के कमाण्डर हैं. यही नहीं, पुलिस और अख़बारों ने मिल कर ऐसा ख़ौफ़ का वातावरण पैदा करने की कोशिश भी की जिस से सीमा के परिवार और मित्रों का मनोबल टूट जाये.
अभय ने अपने ब्लौग मॆं पुस्तक मेले का ज़िक्र किया है. मज़े की बात है कि पांच फ़रवरी को उसी पुस्तक मेले में अभय, मैं और सीमा साथ थे और जिस साहित्य को पुलिस और अख़बार नक्सलवादी बता रहे हैं वे पुस्तक मेले से ख़रीदी गयी किताबें थीं.
बहरहाल, आज की तरफ़ लौटें तो सीमा और विश्वविजय की रिमाण्ड के चौदह दिन आज पूरे हो रहे थे और आज दोनों को अदालत में पेश होना था. हम ग्यारह बजे ही अदालत पहुंच गये. लगभग दो घण्टे के इन्तज़ार के बाद सीमा और विश्वविजय को अदालत में लाया गया. मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि दोनों इन चौदह दिनों में थोड़े दुबले भले ही हो गये थे लेकिन दोनों का मनोबल ऊंचा था. सीमा के चेहरे पर एक दृढ़्ता थी और विश्वविजय के चेहरे पर मुस्कान. सीमा हमेशा की तरह मुस्कराती हुई आयी और उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. लगा जैसे सलाख़ों के पीछे क़ैद स्वाधीनता चली आ रही हो.
हम लोग काफ़ी देर तक सीमा से बातें करते रहे, बिना फ़िकर किये कि सरकार के तमाम गुप्तचर किसी-न-किसी बहाने से आस-पास मंडरा रहे थे और . जब हम आने लगे तो सीमा ने ख़ास तौर पर ज़ोर दे कर कहा कि उसे तो बयान देने की इजाज़त नहीं है, इसलिए वह पुलिस और मीडिया के झूठ का पर्दाफ़ाश नहीं कर पा रही, लेकिन मैं सब को बता दूं कि पुलिस की सारी कहानी फ़र्ज़ी है जैसा कि हम बार-बार देख चुके हैं
सो दोस्तो, यह रिसाला जैसा भी उखड़ा-उखड़ा है सीमा की बात आप सब तक पहुंचाने के लिए भेज रहा हूं. सीमा की रिमाण्ड की अर्ज़ी खारिज हो गयी है. २२ तारीख़ को उसे ज़मानत के लिए पेश किया जायेगा और आशंका यही है कि उसे ज़मानत नहीं दी जायेगी. आशंका इस बात की भी है कि स्पेशल टास्क फ़ोर्स सीमा और विश्वविजय को अपनी रिमाण्ड में ले कर पूछ-ताछ करें और जबरन उनसे बयान दिलवायें कि वे ऐसी कार्रवाइयों में लिप्त हैं जिन्हें राजद्रोह के अन्तर्गत रखा जा सकता है. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां सब कुछ सम्भव है– भरपूर दमन और उत्पीड़न भी और जन-जन की मुक्ति का अभियान भी. यह हम पर मुनस्सर है कि हम किस तरफ़ हैं. ज़ाहिर है कि जो मुक्ति के पक्षधर हैं उन्हें अपनी आवाज़ बुलन्द करनी होगी. अर्सा पहले लिखी अपनी कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं :

चुप्पी सबसे बड़ा ख़तरा है ज़िन्दा आदमी के लिए
तुम नहीं जानते वह कब तुम्हारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जायेगी और सर्वधिक सुनायी देगी
तुम देखते हो एक ग़लत बात और ख़ामोश रहते हो
वे यही चाहते हैं और इसीलिए चुप्पी की तारीफ़ करते हैं
वे चुप्पी की तारीफ़ करते हैं लेकिन यह सच है
वे आवाज़ से बेतरह डरते हैं
इसीलिए बोलो,
बोलो अपने हृदय की आवाज़ से आकाश की असमर्थ ख़ामोशी को चीरते हुए
बोलो, नसों में बारूद, बारूद में धमाका,
धमाके मॆं राग और राग में रंग भरते हुए अपने सुर्ख़ ख़ून का
भले ही कानों पर पहरे हों, ज़बानों पर ताले हों, भाषाएं बदल दी गयी हों रातों-रात
आवाज़ अगर सचमुच आवाज़ है तो दब नहीं सकती
वह सतत आज़ाद है

साभार नुक्कड़

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