Movement of thought

April 15, 2010

६२ बटालियन के सिपाही की आत्मकथा

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:21 pm

-किसलय

मेरे आका,
आपकी सेवा मे
गुजारी है सदियां हमने.
सालो हुए –
उफ़नते समन्दर मे रेंगते –
विशालकाय जहाजो की तलहटी मे
जन्जीरों मे जकड़ा हुआ पहुचा था मैं
बनाने को पिरामिड, किले
और तुम्हारी अय्याशियो कि खातिर
विशालकाय महल !!
सनक सवार हुई थी जब तुम्हे
पूरी दुनिया को जीतने की
मैने ही कटाया था अपना सर
-तुम्हारे ही इस हवस कि खातिर.
अपनी जड़ो को अपने ही हाथो काट
बन बैठा था मै ‘बाबू‘
-जरूरत थी जब तुम्हे – ‘भद्र लोक‘ की!
स्टील के साथ गलाया था मैने
-अपना ही शरीर और आत्मा को
तुम्हारी उन गाड़ियो की खातिर
जो मै कभी देख भी नही पाया
अपनी पूरी जिन्दगी मे!
रोशनी को अलविदा कह दिया था मैने
तेल, कोयले और
अन्धेरी गुफ़ाओ मे मिलने वाले
इन अजीबो-गरीब पत्थरो के लिये.
और देखो,
आज फिर से जान गवायी है मैने
तुम्हारे उसी वहशी लालच की खातिर
अपने उन्ही भाइयो के हाथो
जो सदियो पहले
तुम्हारी जन्जीरो को तोड़
उठ खडे हुए थे – स्पार्ट्कस के साथ..

April 7, 2010

कोने

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:56 pm

किसलय

चारदीवारी के अन्दर
भटकता हू गोल-गोल
गोल-गोल, गोल-गोल.
दीवारो से टकराता हूं
बार-बार, बार-बार.
थकता हूं, बैठ जाता हूं
कोने मे चुपचाप.
अच्छे लगने लगते हैं
-कोने भी.
पूछता हूं कोनो से
-पूरी आत्मीयता से
चार ही क्यो है वे?
ज्यादा क्यो नही?
प्यार से समझाते है कोने
-हम तो है तभी तक
जब तक है ये दीवारे.
जितनी दीवारे – उतने कोने !

Blog at WordPress.com.