Movement of thought

October 22, 2010

Hana’s suitcase

Filed under: Books — movementofthought @ 4:57 pm

पुस्तक परिचय

हाना का सूटकेस [Hana’s suitcase]: बच्चों के लिये एक जरूरी पुस्तक

-स्नेहा

आज के समय में जबकि लगभग सभी देशों की सरकारें अपने को सत्ता में बनाये रखने के लिये साम्प्रदायिकता और समय पड़ने पर फ़ासीवाद का सहारा ले रही है, ‘हाना का सूटकेस‘ [Hana’s suitcase] एक ऐसी पुस्तक है जो पढ़ी जानी चाहिये। वैसे यह पुस्तक बच्चों के लिये है और स्कूलों के पुस्तकालयों में [अगर स्कूल मे यह हो तो!] यह पुस्तक जरूर होनी चाहिये ताकि उनके दिमाग मे जब भी कोई साम्प्रदायिक विचार दूषित करने लगे तो हाना की कहानी उन्हे ऐसा होने से बचा सके।
यह कहानी चेकोस्लोवाकिया के एक यहूदी परिवार के दो बच्चों के बारे में है, जिनका बचपन हिटलर की फ़ासीवादी नीतियों के कारण न सिर्फ़ बुरी तरह रौंद डाला जाता है, बल्कि छोटी सी उम्र में ही कन्सन्ट्रेशन कैम्प मे यातना सहते हुए हाना मारी भी जाती है। जबकि हाना के भाई जार्ज पुस्तक लिखे जाने तक जीवित थे। पुस्तक पढ़ते हुए रोचकता इस कारण और बढ़ जाती है कि जापान में रहने वाले कुछ बच्चे अपनी टीचर के साथ चेकोस्लोवाकिया की इस लड़की के बारे में पता करते है, क्योकि उनके पास एक सूटकेस है जिस पर लिखा है – ‘हाना ब्रेडी, १६ मई १९३१, अनाथ‘। पुस्तक मे जापानी बच्चों की खोज और हाना की कहानी साथ-साथ चलती है।
संक्षेप में पुस्तक की कहानी यह है कि जापान में १९९९ में एक योजना के तहत बच्चों को नाजी जर्मनी में हुए नरसंहार की जानकारी देने के लिये एक संग्रहालय बनाया जाता है, जिसमे उस समय और घटना से जुड़ी वस्तुओं का संग्रह किया जाता है ताकि बच्चे इतिहास की इस जघन्यतम घटना से सबक ले सकें। इसी संग्रहालय में चेकोस्लोवाकिया से एक सूटकेस आता है, जिस पर हाना ब्रेडी का नाम लिखा है। संग्रहालय के बच्चे यह जानने के लिये बेहद उत्सुक हो जाते है कि यह किसका सूटकेस है और इस पर ‘अनाथ‘ क्यों लिखा है। इसी खोज में बच्चे अपनी अध्यापिका फ़ुमिको इशीओका से सम्बन्धित देशों, शहरों और संग्रहालयों को कई पत्र लिखवाते है। इसी बीच फ़ुमिको को यूरोप जाने का मौका मिलता है तो वह लगे हाथ हाना के बारे में छानबीन करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा देती है और वहीं से उसे पता चलता है हाना का एक भाई था जो अभी भी जीवित है और कनाडा मे रहता है। फ़ुमिको जापान लौट कर उसे पत्र लिखती है और हाना की कहानी बच्चों को पता चलती है।
हाना और जार्ज का जीवन आम बच्चों की तरह बेहद मस्ती भरा था, जबतक कि हिटलर की यहूदी विरोध की नस्लीय नीति उनके छोटे से कस्बे को भी अपने कब्जे में नही ले लेती। इस नीति के चलते हाना अपने संगी-साथी, स्कूल, खेल कूद सबसे बिछड़ जाती है। फ़िर एक दिन वह अपनी मां फ़िर अपने पिता से बिछड़ जाती है, क्योकि उन्हे नाजी प्रताड़ना गृह में भेज दिया जाता है। कुछ दिन बाद हाना और जार्ज को भी एक अलग प्रताड़ना गृह में भेज दिया जाता है, जहां दोनों भाई बहन हफ़्ते में एक दिन सिर्फ़ दो घण्टे के लिये मिल पाते है। इस वक्त हाना की उम्र मात्र १३ वर्ष और जार्ज की उम्र मात्र १५ वर्ष थी। कुछ ही दिन बाद जार्ज को अलग कैम्प में भेज दिया जाता है और हाना एकदम अकेली हो जाती है। कुछ दिन बाद उसे भी एक दूसरे कैम्प में भेज दिया जाता है, वहां वह खुश हो कर जाती है कि उसके भाई से मुलाकात होगी पर उसे गैस चैम्बर में बन्द करके मार दिया जाता है।
करेन लेविन द्वारा लिखी गयी यह एक सच्ची कहानी है और पुस्तक में दी गयी हाना और उसके परिवार की तस्वीरें, कन्सन्ट्रेशन कैम्प में हाना द्वारा बनायी गई पेण्टिंग्स इस ७०-८० साल पहले की कहानी को एकदम जीवन्त बना देती है। साथ ही फ़ासीवाद के प्रति नफ़रत भी पैदा करती है।
आज के समय में भारत में, जबकि साम्प्रदायिक फ़ासीवाद शोषक वर्गो का मुख्य हथियार बन गया है, और ऐसे समय में जबकि हिटलर पर एक ऐसी फ़िल्म बनने जा रही है जो उसके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहुलुओं को लोगों के सामने लाने का दावा कर रही है [जिसमे हिटलर की भूमिका पहले अनुपम खेर निभाने वाले थे, पर काफ़ी विरोध के बाद उनके इन्कार करने पर यह भूमिका रघुवीर यादव निभाने जा रहे है], यह पुस्तक हमारी बच्चा पीढ़ी को अवश्य पढ़ानी चाहिये [बड़ो के लिये तो इस विषय पर बहुत सी किताबे और फ़िल्में हैं] ताकि वे नस्लीय राजनीति की साजिश का शिकार होने से बच सकें। यह पुस्तक हिन्दी में अनुदित होकर आये तो यह और भी उपयोगी साबित होगी क्योकि बस यही इसकी खूबियों की सीमा है।

पुस्तक – Hana’s suitcase
लेखक – Karen Levine
प्रकाशक- Jyotsna prakashan, pune
e-mail : jyotsnaprakashan@vsnl.com
वर्ष – 2002 (first indian edition – Dec 2007)
मूल्य – Rs 125

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