Movement of thought

January 6, 2011

तितलियों का खू़न

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:36 pm

-अंशु मालवीय

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं
कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं
सबक सीखकर,
फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मी पर बहने के लिये है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है….. कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।

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January 4, 2011

बीर बिनायक

Filed under: Literature — movementofthought @ 3:22 pm

-मृत्युंजय

[ http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/ से साभार ]

बीर बिनायक बांके दोस्त !
थको नहीं हम संग तुम्हारे
झेल दुखों को जनता के संग
कान्धा भिड़ता रहे हमेशा
यही भरोसा यही भरोसा
बज्र कठिन कमकर का सीना
मज्जा मांस और रकत पसीना
मिलकर चलो जेल से बोलें
जिनकी काटी गयीं जुबानें
उनके मुंह के ताले खोलें

साथी देखो यही राज है
यही काज है
लोकतंत्र का पूर्ण नाश है
लोकसभा और राज सभा
की नूतन अभिनव बक्क वास है
देखो इनके लेखे पूरा
देश एक मैदाने घास है

देशभक्ति का दंगल देखो
रमन सिंह के छत्तीसगढ़ में
चिदंबरम के राज काज में
वेदांता के रामराज में
उगा हुआ है जंगल देखो
नियमगिरी क़ी नरम खाल से
नोच रहे हैं अभरक देखो

देखो बड़ा नमूना देखो
कैसे लगता चूना देखो
भ्रष्ट ज़ज्ज़ और भ्रष्ट कलेक्टर
सबकुछ अन्दर सबकुछ अन्दर
चूस रहे हैं बीच बाज़ार
नंगे नंगे बीच सड़क पर
खुल्लम खुल्ला खोल खालकर
नाच रहे हैं
देशभक्ति का प्रहसन देखो
टेंसन देखो
अनशन देखो

राडिया वाला टेप देख लो
बरखा जी और बीर सांघवी
नई नवेली खेप देख लो
देखो मिस्टर मनमोहन को
जे पी सी अभिनन्दन देखो
ही ही ही ही दांत चियारे
देखो मिस्टर देशभक्त जी
कौन जगह अब पैसा डारें
घूम रहे हैं मारे मारे
कलमाडी क़ी काली हांडी
देखो
अडवाणी क़ी मूंछ देखो
येदुरप्पा क़ी पूँछ देखो
रेड्डी क़ी करतूत देखो
लोकतंत्र के पूत देखो
भूत देखो

पैसा देखो
भैंसा देखो
ऐसा देखो
वैसा देखो
लाइन से सब देशभक्त हैं
इससे पूरा देश त्रस्त है
देखो

नक्सल देखो
डी जी पी के कुशल दांत में लगा हुआ है बक्कल देखो
सलवा जुडूम बनाने वाले
रक्त काण्ड रचवाने वाले
जल जंगल जमीन के भीतर
महानाश रचवाने वाले
देखो नए दलाल देखो
टमाटरी हैं गाल देखो
पी एम सी एम हाउस भीतर
कोर्ट के भीतर कोर्ट के बाहर
हंडिया भीतर
काली काली दाल देखो
देखो रोज़ कमाल देखो

जान बचाने वाले
लाज रखाने वाले
लड़ भिड जाने वाले
सत्य बोलने वाले
देखो
नए नए है देश दुरोहित
नयी नयी परिभाषा देखो
शासन क़ी अभिलाषा देखो
भाषा देखो
जेल देखो
सेल देखो
खनिज लादकर छत्तीसगढ़ से जाने वाली रेल देखो
जनता के अधिकार देखो
ह्त्या का व्यापार देखो

घी में सनी अंगुलियाँ देखो
हीरे क़ी झिन्गुलिया देखो
बड़े चोर का घाव देखो
विपक्षी का ताव देखो
लगे फिटकरी जियें गडकरी
चेहरा देखो संग मरमरी
कांग्रेस के मंतर देखो
बन्दर देखो
अभी अभी बिल से निकला है जनपथ पर छछुन्दर देखो
माल देखो
ताल देखो
डेमोक्रेसी क़ी टटकी टटकी उतरी है यह खाल देखो

ज़ज्ज़ के घर में नेता बैठा नेता घर अखबार
प्रजातंत्र का विकसित होता नव नव कारोबार
बीर बिनायक तुम जैसों से ही बाकी है देश
भिड़ बैठेंगे आयें जितने बदल-बदल कर भेष

January 2, 2011

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:32 pm

[http://www.janjwar.com/ से साभार]

-मुकुल सरल

हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं
ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचें जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

October 17, 2010

पल

Filed under: Literature — movementofthought @ 10:15 am

-किसलय

पल
जो ठिठक कर रुका है
– सहमा सा
देखता है आंखे फ़ाड़े
दूर तक पसरे अंधेरे सन्नाटे
और भूरे आसमान को.
पल
जो ठिठक कर रुका है
सहमा सा
सुन रहा है –
झिंगुरो की आवाजे,
खिड़कियों से रिसती
-ब्रेकिंग न्यूज
रियलिटी शो के हंसी ठठ्ठे
और सूदूर से आती
इंसानी चीखें.
पल
जो निकल पड़ा था
मुंह अंधेरे
ठिठक कर खड़ा है
-चुपचाप
एक पांव हवा में उठाये
टटोलता है अपनी गर्दन से
दसियो दिशायें
खींच रहा है बारीक सूत
हर दिशाओ से.
पल
जो ठिठक कर रुका है
बुन रहा है चुपचाप
– सूदूर भविष्य को
इस निर्मम समय में भी.

August 15, 2010

सुबह का रंग भूरा

Filed under: Literature — movementofthought @ 12:00 pm

[ The one thing which fascism can’t tolerate is diversity. Fascism always impose one culture, one language, one thought, one view and one choice.
In this story, writer has beautifully described this character of fascism. This story shows how fascism ultimately invades each and every walk of our life if we don’t resist it.
This story was first published in France in 1998 and till then more that 500,000 copies has been sold. It has also been translated into several languages. This story was published in Samayantar magazine in June 2010. -Editor ]

जून 2010 के समयान्तर से साभार

-फ्रांक पावलोफ

चार्ली और मैं धूप में बैठे थे। हम दोनो में से कोई ज्यादा बात नहीं कर रहा था। बस दिमाग में आ रहे ऊल जूलूल खयालों के बारे में परस्पर बतिया रहे थे। ईमानदारी से कहूं तो मैं उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। हम काफी की चुस्कियां ले रहे थे और समय सुखद गति से व्यतीत हो रहा था। हम दुनिया की गतिशीलता को निहार रहे थे। वह मुझे अपने कुत्ते के बारे में कुछ बता रहा था। किसी इन्जेक्शन के बारे में जो उसे कुत्ते को देना पड़ा था। लेकिन तब भी मैने वाकई ज्यादा गौर नहीं किया था।
बेचारे जानवर की तकलीफ दुखद थी। हालांकि ईमानदारी से कहें तो उसकी उम्र 15 साल थी, जो कुत्ते के लिए एक भरी पुरी आयु है। इस लिए तुमने सोचा था कि वह इस बात से वाकिफ है कि कुत्ते को किसी दिन जाना ही है।
‘‘देखो’’, चार्ली ने कहा ‘‘ मैं उसे भूरे रंग का तो नहीं बता सकता था।’’
‘‘हां जाहिर है। वह आखिर एक लेबराडोर था, वह काला लेबराडोर ही तो था न? खैर छोड़ो, उसे हुआ क्या था?’’
‘‘कुछ भी नहीं। बस यही कि वह भूरा कुत्ता नहीं था। बस इतना ही।’
‘‘क्या? तो अब उन्होने भी कुत्तों पर भी शुरू कर दिया।’’
‘‘हां’’’
पिछले महीने बिल्लियों के साथ ऐसा हुआ था। मैं बिल्लियों के बारे में जानता था। मेरे पास भी एक थी। एक आवारा बिल्ली जिसे मैने पाला था। काले और सफेद रंग की एक नन्हीं गन्दी सी बिल्ली। मैं उसे पसंद करता था। लेकिन मुझे उससे छुटकारा लेना पड़ा।
मेरे कहने का मतलब है कि उनके पास भी तर्क है। बिल्लियों की आबादी बेकाबू हो रही थी और जैसा कि सरकारी वैज्ञानिक कह रहे थे कि मुख्य चीज़ है भूरी बिल्लियों को ही पालना। ताजा प्रयोगों के मुताबिक भूरे पालतू जानवर दूसरों के मुकाबले हमारी आधुनिक शहरी ज़िन्दगी के लिहाज से ज्यादा अनुकूल हैं। वे कम गन्दगी करते हैं और खाते भी बहुत कम हैं। किसी भी हालत में, बिल्ली आखिर बिल्ली है और भूरे रंग से इतर रंग वाली बिल्लियों से छुटकारा पाकर एक बार में ही समस्या का निदान कर लेना समझदारी की बात है।
सैन्य पुलिस आरसेनिक की गोलियां मुत दे रही थी। आपको करना ये होता था कि उनके खाने में गोलियां मिला दो और कहानी खत्म। एक बारगी मेरा दिल टूट गया। लेकिन मैं जल्द ही इससे उबर गया।
मुझे यह बात मान लेनी चाहिए कि कुत्तों की खबर ने मुझे थोड़ा सा झिंझोड़ दिया था। मुझे नहीं पता था कि क्यो। खासकर शायद इस लिए कि वे अपेक्षाकृत बड़े होते हैं या शायद इस लिए कि वे मनुष्य के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं जैसा कि कहा जाता है।
खैर, चार्ली ने इस मामले में कदम बढ़ा ही दिये थे। और यह सही भी था।
आखिरकार इन चीजों के बारे में ज्यादा ही माथा पच्ची करने से कुछ होना हवाना नहीं था। और जहां तक बुरे कुत्तों की बात है कि वे औरों से बेहतर हैं, मैं समझता हूं कि यह बात सही ही होगी।
हम दोनों के बीच ज्यादा कुछ बात करने लायक नहीं बचा तो थोड़ी देर बाद हमने अपनी अपनी राय ली।
लेकिन दिमाग के कोने में मुझे लग रहा था कि कुछ अनकहा रह गया है। बाकी का दिन इसी संदेह के साये में गुजरा।
इस घटना को बीते ज्यादा दिन भी नहीं हुए कि चार्ली को ब्रेकिंग न्यूज़ देने की मेरी बारी आ गयी। मैने उसे बताया कि ‘‘डेली अब कभी नहीं छपेगा’’
द डेली, जिसे वह काफी पीते हुए हर सुबह पढ़ता था।
‘‘तुम कहना क्या चाहते हो? क्या वे हड़ताल पर हैं? क्या वे दीवालिया हो गए हैं या कुछ और?’’
‘‘नहीं, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका सम्बन्ध कुत्तों वाले मामले से है।’’
‘‘क्या भूरे वाले?’’
‘‘बिल्कुल सही। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब उन्होंने उस नए कानून के बारे में बात न की हो। बात यहां तक आ पहुंची कि उन्होने वैज्ञानिक तथ्यों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिये थे। मेरे कहने का मतलब ये कि पाठको को पता ही नहीं था कि वे और क्या सोचें। उनमें से कुछ ने अपने कुत्ते छिपाने शुरू कर दिये थे।’’
‘‘लेकिन यह तो संकट को बुलावा है।’’
‘‘हां , बिल्कुल, और इसलिए अब अखबार पर पाबन्दी लगा दी गयी है।’’
‘‘तुम मजाक कर रहे हो। रेसिंग क्या होगा।’’
‘‘हूं, मेरे पुराने दोस्त तुम्हे तो उस बारे में टिप्स आने वाले दिनों में ब्राउन न्यूज से लेनी शुरू करनी होगी। नहीं लोगे क्या। और कुछ भी नहीं है यहां। खैर घुड़दौड़ का उनका सेक्शन ऊपरी तौर पर बुरा नहीं है।’’
‘‘दूसरे बहुत आगे निकल गए। लेकिन आखिरकार तुम्हे किसी तरह का अखबार तो मिल ही रहा है। यानी क्या चल रहा है यह जानने का तुम्हारे पास कोई जरिया तो रहेगा ही। क्यो।’’
मैं चला था कि चार्ली के साथ इत्मीनान से काफी पियूंगा। और यहां मैं ब्राउन न्यूज का एक पाठक बनने की चर्चा में ही उलझा हुआ था। कैफे में मेरे आसपास बैठे और लोग अपने में व्यस्त थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं जाहिरा तौर पर खामख्वाह हलकान हुए जा रहा था।
उसके बाद बारी थी लाइब्रेरी की किताबों की। इस बारे में कुछ ऐसा था जो सही नहीं था। ‘द डेली’ सरीखे संगठनों से जुड़े प्रकाशन संस्थानों को अदालत में घसीटा गया था और उनकी किताबें, पुस्तकालयों और किताब की दुकानों से हटा ली गयी थीं। लेकिन फिर दोबारा उनकी प्रकाशित हर चीज़ में कुत्ता या बिल्ली शब्दों का उल्लेख होता महसूस होता था। हमेशा ‘भूरे’ शब्द के साथ न भी हो तब भी। तो उनकी मंशा जाहिर थी।
‘‘यह तो बिल्कुल बुड़बक वाली बात है’’, चार्ली ने कहा।
‘‘कानून, कानून है। उसके साथ चूहे बिल्ली का खेल करने का कोई मतलब नहीं है।’’
‘भूरा’, उसने जोड़ा, अपने आसपास देखते हुए कि कहीं कोई हमारी बातचीत सुन तो नहीं रहा था। ‘भूरा चूहा’।
सुरक्षा के लिहाज से हमने वाक्यांशों, या दूसरे खास शब्दों के पीछे भूरा जोड़ना शुरू कर दिया था। हम ब्राउन पेस्ट्री के बारे मे दरियात करते। शुरू में यह थोड़ा अटपटा लगा। लेकिन स्लैंग तो यूं भी हमेशा बदलता रहा है, इसलिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम अपनी बात के आखिर में ‘भूरा’ जोड़ें या कहें भाड़ में जाओ। जो कि हम आम तौर पर कहते ही थे। कम से कम इस तरह हमने कोई मुसीबत मोल नहीं ली थी और यही तरीका हमें अच्छा लगता था।
यहां तक कि हमें घोड़ों पर भी जीत नसीब हुयी। मेरा मतलब, ये कोई जैक पाट या और कुछ नहीं था। लेकिन ये थी तो जीत ही। हमारी पहली भूरी विजय। और इस तरह बाकी हर चीज़ ओके लगने लगी।
चार्ली के साथ बिताया एक दिन मैं हमेशा याद रखूंगा। मैने उसे कप का फाइनल देखने के लिए अपने घर बुलाया था। और जैसे ही एक दूसरे से मिले, हम हस पड़े। उसने नया कुत्ता लिया था। वह एक भारी जानवर था। पूंछ की नोक से लेकर थूथन तक भूरा का भूरा। उसकी आंखें भी भूरी थी।
‘‘है न ग़जब का, ये मेरे पुराने कुत्ते से ज्यादा दोस्ती वाला है। ज्यादा स्वामिभक्त भी। मैं भी उस काले लेबराडोर के बारे में क्या बातें लेकर बैठ गया था।’’
जैसे ही उसने यह कहा उसके नए कुत्ते ने सोफे के नीचे डाइव मारी और भौंकना शुरू कर दिया। और हर भूंक में मानो वह कहता था, ‘‘मैं भूरा हूं, मैं भूरा हूं और कोई मुझे नहीं बताता था कि मुझे क्या करना है।’’
हमने उसे हैरत से देखा। और तभी सिक्का गिरा।
‘‘तुम भी’’ चार्ली ने कहा।
‘‘मैं डर गया हूं।’’
आप देखिए उसी वक्त मेरी नयी बिल्ली कमरे में कूदी और अल्मारी के ऊपर छिपने के लिए पर्दे पर जा चढ़ी। भूरे फर वाली बिल्ली। और वे भूरी आंखें जो लगता था, आप जहां जहां जाते है, वे आपका पीछा करती रहती हैं। और इसलिए हम दोनो हस पड़े थे। संयोग के भी क्या कहने।
‘‘मैं भी बिल्ली वाला आदमी हूं वैसे। देखो कितनी प्यारी है। है न?’’
‘‘सुन्दर’’, उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा। फिर हम टीवी की ओर मुखातिब हुए। हमारे दोनो भूरे जानवर अपनी आंखों के कोनों से एक दूसरे को होशियारी से घूर रहे थे।
मैं आपको नहीं बता सकता कि इतना सब होने के बाद आखिर उस दिन फाइनल किसने जीता। मैं उस दिन को वास्तविक हंसी के दिन की तरह याद रखता हूं। हमने वाकई महसूस किया कि शहर भर में जो बदलाव किये जा रहे थे उनके बारे में आखिरकार चिन्तित होने की कोई वजह नहीं थी मतलब आप वही करते थे जो आपसे अपेक्षित था और आप सुरक्षित थे। शायद नए निर्देशों ने हरेक की ज़िन्दगी आसान बना दी थी।
जाहिर है, मैने उस छोटे बच्चे को भी अपने खयालों में जगह दी थी जो उस दिन सुबह मुझे दिखा था। वह सड़क के दूसरे किनारे पर घुटनों के बल बैठा रो रहा था। उसके सामने जमीन पर एक नन्हा सा सफेद कुत्ता मरा पड़ा था। मैं जानता था कि वह जल्द ही इस हादसे से उबर जाएगा। आखिरकार ऐसा नहीं था कि कुत्तों की मनाही कर दी गयी थी। उसे करना यह था कि भूरा कुत्ता लाना चाहिए था। आपको ठीक वैसा ही गोद मे खिलाया जाने वाला पूडल मिल सकता था, जो वहां उस बच्चे के पास था। तब वह भी हमारी तरह होता। यह जानकर अच्छा लगता है कि आप कानून का सही पालन करते हैं।
और फिर कल, ठीक ऐसे वक्त जब मुझे लगता था कि सब कुछ सही है, मैं बाल बाल बचा वरना सेना पुलिस ने धर लिया होता। भूरी पोशाक वाले लोग। वे कभी आपको यूं ही नहीं जाने देते। खुशकिस्मती से उन्होने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि वे इलाके में नए थे। और हर किसी को अभी नहीं जानते थे। मैं चार्ली के घर जा रहा था। इतवार का दिन था। और मैं उसके घर ताश खेलने जा रहा था। मैं अपने साथ बीयर की कुछ बोतलें भी ले जा रहा था। आपको ताश के मजेदार खेल तो जब तब खेलते ही रहने होंगे। मेज पर ताल बजाते हुए और कुछ चना चबैना करते हुए एक दो घण्टे बिताने की बात थी।
जैसे ही मैं सीढ़ियों पर चढ़ा मुझे अपनी ज़िन्दगी का पहला धक्का लगा। उसके घर का दरवाजा खुला पड़ा था। और सेना पुलिस के दो अफसर दरवाजे के सामने खड़े थे। वे लोगों से चलते रहने को कह रहे थे। मैने ऐसे जाहिर किया जैसे मैं ऊपर की मंजिल के लैट में जा रहा हूं और सीढ़ियों पर चढ़ गया। ऊपर से मैं लिट से नीचे उतर आया। बाहर सड़क पर फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं।
लेकिन उसके पास तो भूरा कुत्ता है। हम सबने देखा है।
ठीक है, हां, लेकिन वे कह रहे हैं कि पहले तो उसके पास काला था।
‘‘पहले’’?
‘‘हां, पहले। आपके पास पहले से ही कोई भूरा कुत्ता न होना भी अब एक जुर्म है। और इस बात की जानकारी मिलना मुश्किल नहीं है। वे कुछ नहीं करेंगे सिर्फ पड़ोसियों से पूछ लेंगे।’’
मैं फौरन चला आया। मेरी गर्दन के पीछे पसीने ठंडी धार रेंगती हुयी गयी।
अगर पहले आपके पास किसी और रंग का जानवर होना अपराध है तो सेना पुलिस किसी भी वक्त मेरे पीछे भी लग जाएगी। मेरे ब्लाक में सब जानते थे कि पहले मेरे पास काली-सफेद बिल्ली थी। पहले! मैने इस बारे में तो कभी नहीं सोचा था।
आज सुबह, ब्राउन रेडियो ने समाचार की पुष्टि कर दी। गिरतार किये गए पांच सौ लोगों में चार्ली भी था। अधिकारियों का कहना था कि भले उन लोगों ने हाल में भूरा जानवर खरीद लिया हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं था कि उन्होने वास्तव में अपने सोचने का तरीका भी बदल दिया हो।
‘‘किसी पुराने समय में ऐसे कुत्ते या बिल्ली का स्वामी होना जो समरूप नहीं है, एक अपराध है’’, उद्घोषक ने ऐलान किया। फिर उसने जोड़ा – ‘‘ यह राज्य के विरुद्ध अपराध है’’।
उसके बाद जो हुआ वह और भी बुंरा था। अगर आपने खुद कभी कुत्ते या बिल्ली न रखें हों लेकिन अगर आपके परिवार में किसी ने -आपके पिता या भाई या रिश्तेदार ने अपनी जिन्दगी में कभी भी ऐसे कुत्ते बिल्ली पालें हों जो भूरे न रहें हों तो ऐसी स्थितियों में भी आप दोषी हैं। आप हर हाल में दोषी हैं।
मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने चार्ली के साथ क्या किया।
यह पूरा मामला हाथ से निकल रहा था। दुनिया बौरा गयी थी। और मैं, भलामानुस सोच रहा था कि मैं अपनी नयी भूरी बिल्ली के साथ सुरक्षित हूं।
जाहिर है, अगर वे पहले पाले गए जानवर के रंग को आधार बनाएं तो जिसे चाहें उसे गिरतार कर सकते हैं।
मैं उस रात पलक तक नहीं झपका सका। मुझे शुरू से ही ‘ब्राउन्स’ पर संदेह होना चाहिए था। जानवरों के बारे में उनका पहला कानून। मुझे उस समय कुछ कहना चाहिए था। आखिरकार, वह मेरी बिल्ली थी। और कुत्ता चार्ली का था। हमें सिर्फ यह कहना चाहिए था-नहीं। उनके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन हम क्या कर सकते थे? मतलब, सबकुछ इतनी तेजी से हुआ। और फिर कामकाज भी था और दुनिया भर की दूसरी चिन्ताएं। और यूं भी हम कोई अकेले तो थे नहीं। हर किसी ने ऐसा किया था। अपने सिर झुकाए रखे। हम महज थोड़ी सी शान्ति और तसल्ली चाहते थे।
कोई दरवाजा खटखटा रहा है। यह तो सुबह का वक्त है। बहुत सुबह। इस समय तो कोई राउण्ड पर नहीं आता। अभी तो उजाला भी नहीं फूटा है। अभी तो सुबह का रंग भूरा है।
जोर जोर से दरवाजा पीटना बन्द करो। मैं आ रहा हूं…………………..।

प्रस्तुति और अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

June 16, 2010

हरियाली के आखेटक

Filed under: Literature — movementofthought @ 6:11 pm

[पाखी पत्रिका (जून २०१० अंक) से साभार]

-अंशु मालवीय

अब चल पड़ी है बस्तर में कहावत एक
कि जैसे-
पावर प्लांट वालों के घर बच्चे पैदा होते हैं
पावर के साथ,
स्टील प्लांट वालों के द्घर बच्चे पैदा होते हैं,
लोहे के दाँतों के साथ,

मुरिया गोंड के घर बच्चे पैदा होते हैं,
अपनी धरती अपने साथ लेकर!
नाभि-नाल से जुड़ी, एक अदद अपनी
गर्भ-द्रव में सनी लथपथ हरियाली धरती…
जनम के समय, पुरखों की छाती का नगाड़ा
पैरों से बजाता-नाचता है गाँव-आसमान से चूती है
चाँदनी महुए सी,
नन्हें बच्चों की लार में बहती है नमी वीरान जंगलों की
दण्डकारण्य के सन्नाटे में शोर मचाता चित्रकूट का झरना फूटता है
उनकी किलकारियों में,
साल के पुराने वृक्ष उनके पैरों की नसों में उतरते
धंसते चले जाते हैं, पानी की तलाश में चट्टानों को तोड़ते
जड़ें फैलती जाती हैं
पुकारती मिट्टी के भीतर… ‘इन्द्रावती-इन्द्रावती’…
इन्द्रावती की लहरों के पालने में झूलते हैं दिग-दिगंत
नीले वितान तले हरे… बहुत हरे… गाढ़े काही स्वप्न!
फैलती हैं साल की जड़ें-बॉक्साइट की सहलाती
कोयले से लिपटती, लोहे को पुचकारती
फैलती जाती हैं जड़ें नियामगिरी से बैलाडीला तक
पारादीप से झरिया तक धरती में रक्त का प्रवाह लेकर
भागती, अति नवीन पुरातन जड़ें
धरती की निद्रा में स्वप्न रेशों सी फैलती जड़ें
दामोदर के पेट की आग लेकर कोयलकारो में बुझाती
इन्द्रावती में तैरती काइयों के शव
सुवर्णरेखा के जहरीले पानी में बहाती
फैलती जाती हैं जड़ें निर्भीक, उदास और उजड्ड जड़ें।
मादल की थाप पर उड़ती है चील एक विकल बदहवास
आसमान के गुम्बद में लेकर उड़ती है कोयले का चाँद
और मारती है टिहकारी
…टिहकारी से गिरती है बिजली
जन्मजात विकृत बच्चों की एक पाठशाला पर
पाठशाला पर लिखा है… रेडियोएक्टिव शिक्षा के केंद्र
जा… दू… गो… ड़ा… में आपका स्वागत है।
वहाँ से दूर संथाल परगना के किसी जंगल में
अपने टूटे हुए धनुष से पथरीली जमीन को कुरेदते
तिल्का माँझी की आँख से रक्त के सोते फूटते हैं…
बुदबुदाता है अकेला बैठा… सुनो… सुनो
शोर है बहुत, कैटरपिलर का शोर ऊँचा होता जा रहा है
सुनो शोर है बहुत… बारूद का, ट्रकों का, सरकारी गाड़ियों का
कोयले की गर्द आसमान की आँखों में पैठती जाती है
तिल्का माँझी बुदबुदाता है…
क्या बोलता है अपने टूटे हुए धनुष से कुरेदते हुए पथरीली जमीन
बुदबुदाता है- धरती… धरती… धरती…!
धरती… धरती… धरती…!
‘धरती के हम मालिक नहीं… हम रखवाले हैं।
सौंपनी है धरती हमें अपनी वाली पीढ़ी को… कैसी धरती?’
अपने घावों का मुँह बंद करती काली-लाल मिट्टी से
हवा भागती है-
जंगल दर जंगल, पहाड़ दर पहाड़
गाँव से शहर-शहर से झोपड़पट्टियों तक
अल्मुनियम का कटोरा थामे… उसी अल्मुनियम का
जिसके लिए बॉक्साइट की खदानों को अपना यौवन दिया था उसने
उत्पादक-मजदूर-भिखारन हवा
उसी लोहे की बेड़ियाँ पहने, जिसकी खानों में उड़ती गर्द ने
उसके फेफड़ों में घोसला बनाया… है, खाँसती, खामोश हवा।
कहानी सुनाती है हवा, जले हुए वृक्षों के आधे धड़ों को-
‘बहुत-बहुत’ समय पहले की बात हैऋ इस जंगल में
एक राष्ट्र, राज करता था-
उसने नदियों को बोतलों में बंद किया
-उसने वृक्षों को गमलों में कैद किया
-उसने जमीन का लोहा खींचा
-और उससे पलंग बनाकर सो गया
ये खदानों के विस्फोट नहीं राष्ट्र के खर्राटे हैं
ये बाँधों में लहरों के थपेड़े नहीं राष्ट्र की करवटें हैं
जिसके नीचे कुचल जाती हैं
सभ्यताएँ
भाषाएँ
ज्ञान
और संस्कृतियाँ…।
उसके राज में रोटियाँ, चिमटों की गुलाम थीं
साहित्य चुगली के काम आता था
इतिहास बलि माँगता था
और विज्ञान- सामूहिक नरसंहारों की मनोरंजक फ़िल्में बनाता था।
…कहानी की लय टूटती है…
भौंकते आते हैं ‘ग्रे हाउण्ड’ मिथ्या शहादत की राष्ट्रीय दुम हिलाते
उनके बूटों से चरमराते हैं पत्ते, बच्चों की पसलियों जैसे
उनके पीछे आते हैं अर्थशास्त्री ग्रोथ रेट का नगाड़ा पीटते
उनके पीछे आते हैं उद्योगपति-ठेकेदार-माफ़िया विकास का गंडासा लिए
उनके पीछे आते हैं मंतरी-संतरी, दलाल-अफसर
संगीनों पर लटके सहमति पत्र लिए
फ़िर आता है कैमरे, कपड़े और आँकड़े चमकाता मीडिया
अंत में आती है हरियाली… हमेशा की तरह विनम्र और महान
गरदन उतारे जाने के ठीक पहले
अपनी गरिमामय मृत्यु को निहारती है स्नेह से
और नजर डालती है पूरे अमले पर
बोलती है
ठीक वैसी ही आवाज में जैसे सावन-भादो की स्याह रातों को
उमड़ते हुए बादल बोलते हैं-
‘बड़े-बड़े प्रतापी राजा चले गये
धर्मराज युधिष्ठिर भी गये खाली हाथ
ये धरती किसी के साथ नहीं गई
हे राजन!
ये तुम्हारे साथ भी नहीं जाएगी।’

June 1, 2010

सुनो यह विलाप

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:26 pm

– आलोक श्रीवास्तव

अवध की एक शाम पुकारती है
लोगो सुनो
लहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर
बिछा दो तुम जाजम
रौशनियां
तुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईद
उस मातम को छिपा नहीं पाएगी
जो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी है
पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता है
ढही मेहराबों और ऊंचे बुर्जों के पीछे से एक कराह उठती है
गोमती का सूखा पानी
किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है
इस लुटे पिटे शहर की वीरानी
क्या रोती है तुम्हारी रात में?
तुम अपने ही शहर के आंसू नहीं देख पाते!
जनरल नील का कत्लेआम
इलाहाबाद की दरख्त घिरी राहों से चलता
देखो दंडकारण्य तक जा पहुंचा है
पद्मा से सोन तक
मेरी प्रिया का वह लहराता आंचल था मेरे ख्वाब में झलकता
खून के धब्बे गाढ़े होते जाते हैं आज उस पर
और हत्यारों को तोपों की सलामी जारी है
तिरंगे की साक्षी में
सुनो अवध का विलाप
फैलता जा रहा है समूचे मुल्क में
मौत की, मातम की
गुलामी की रात तुम्हारे सिरहाने खड़ी है…

April 15, 2010

६२ बटालियन के सिपाही की आत्मकथा

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:21 pm

-किसलय

मेरे आका,
आपकी सेवा मे
गुजारी है सदियां हमने.
सालो हुए –
उफ़नते समन्दर मे रेंगते –
विशालकाय जहाजो की तलहटी मे
जन्जीरों मे जकड़ा हुआ पहुचा था मैं
बनाने को पिरामिड, किले
और तुम्हारी अय्याशियो कि खातिर
विशालकाय महल !!
सनक सवार हुई थी जब तुम्हे
पूरी दुनिया को जीतने की
मैने ही कटाया था अपना सर
-तुम्हारे ही इस हवस कि खातिर.
अपनी जड़ो को अपने ही हाथो काट
बन बैठा था मै ‘बाबू‘
-जरूरत थी जब तुम्हे – ‘भद्र लोक‘ की!
स्टील के साथ गलाया था मैने
-अपना ही शरीर और आत्मा को
तुम्हारी उन गाड़ियो की खातिर
जो मै कभी देख भी नही पाया
अपनी पूरी जिन्दगी मे!
रोशनी को अलविदा कह दिया था मैने
तेल, कोयले और
अन्धेरी गुफ़ाओ मे मिलने वाले
इन अजीबो-गरीब पत्थरो के लिये.
और देखो,
आज फिर से जान गवायी है मैने
तुम्हारे उसी वहशी लालच की खातिर
अपने उन्ही भाइयो के हाथो
जो सदियो पहले
तुम्हारी जन्जीरो को तोड़
उठ खडे हुए थे – स्पार्ट्कस के साथ..

April 7, 2010

कोने

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:56 pm

किसलय

चारदीवारी के अन्दर
भटकता हू गोल-गोल
गोल-गोल, गोल-गोल.
दीवारो से टकराता हूं
बार-बार, बार-बार.
थकता हूं, बैठ जाता हूं
कोने मे चुपचाप.
अच्छे लगने लगते हैं
-कोने भी.
पूछता हूं कोनो से
-पूरी आत्मीयता से
चार ही क्यो है वे?
ज्यादा क्यो नही?
प्यार से समझाते है कोने
-हम तो है तभी तक
जब तक है ये दीवारे.
जितनी दीवारे – उतने कोने !

March 16, 2010

हरी दूबें

Filed under: Literature — movementofthought @ 3:37 pm

किसलय

बन्जर धरती की फटती दरारों से
लहराती है नन्ही दूबें
अपने छोटे हाथो को आसमान की तरफ़ उठाये
मानो छू लेना चाहती हों – नीले आसमान को .
सालो हुए सुनायी नही पड़े थे
– पछियों के गीत
जानें कहा उड़ चले थे सभी.
अब तो नंगी ठूठों पर कब्जा है – गिद्धों का
भयावह शान्ती से देखते हैं वें
-मीलो फैली बन्जर, पथरीली धरती को.
दरारों से निकलती नन्ही दूबें
बुलाती हैं – उन पछियों को
जो भटक कर दूर निकल गये थे कहीं
बुलाती हैं – बिखरे हुए बादलों के टुकड़ों को
भटकते थे तन्हा जो सुदूर आसमां में.
भयावह खतरा है हमारी नंगी ठूठों
और बन्जर जमीनों को – इन दूबों से
-चीखते हैं गिद्ध !!
फ़ैलाते है अपने विशालकाय डैने
उगलते है आग अपनी ख़ूनी निगाहों से
इन नन्ही दूबों पर !
लहराती हैं नन्ही दूबें
बुलाती हैं – पछियों, बादलों और हवाओं को.
शायद फ़ूटनें वाली हैं नन्ही कोपलें
गिद्धों के पावों तले – नंगी ठूठों पर.

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