Movement of thought

June 1, 2010

सुनो यह विलाप

Filed under: Literature — movementofthought @ 5:26 pm

– आलोक श्रीवास्तव

अवध की एक शाम पुकारती है
लोगो सुनो
लहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर
बिछा दो तुम जाजम
रौशनियां
तुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईद
उस मातम को छिपा नहीं पाएगी
जो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी है
पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता है
ढही मेहराबों और ऊंचे बुर्जों के पीछे से एक कराह उठती है
गोमती का सूखा पानी
किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है
इस लुटे पिटे शहर की वीरानी
क्या रोती है तुम्हारी रात में?
तुम अपने ही शहर के आंसू नहीं देख पाते!
जनरल नील का कत्लेआम
इलाहाबाद की दरख्त घिरी राहों से चलता
देखो दंडकारण्य तक जा पहुंचा है
पद्मा से सोन तक
मेरी प्रिया का वह लहराता आंचल था मेरे ख्वाब में झलकता
खून के धब्बे गाढ़े होते जाते हैं आज उस पर
और हत्यारों को तोपों की सलामी जारी है
तिरंगे की साक्षी में
सुनो अवध का विलाप
फैलता जा रहा है समूचे मुल्क में
मौत की, मातम की
गुलामी की रात तुम्हारे सिरहाने खड़ी है…

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April 15, 2010

६२ बटालियन के सिपाही की आत्मकथा

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:21 pm

-किसलय

मेरे आका,
आपकी सेवा मे
गुजारी है सदियां हमने.
सालो हुए –
उफ़नते समन्दर मे रेंगते –
विशालकाय जहाजो की तलहटी मे
जन्जीरों मे जकड़ा हुआ पहुचा था मैं
बनाने को पिरामिड, किले
और तुम्हारी अय्याशियो कि खातिर
विशालकाय महल !!
सनक सवार हुई थी जब तुम्हे
पूरी दुनिया को जीतने की
मैने ही कटाया था अपना सर
-तुम्हारे ही इस हवस कि खातिर.
अपनी जड़ो को अपने ही हाथो काट
बन बैठा था मै ‘बाबू‘
-जरूरत थी जब तुम्हे – ‘भद्र लोक‘ की!
स्टील के साथ गलाया था मैने
-अपना ही शरीर और आत्मा को
तुम्हारी उन गाड़ियो की खातिर
जो मै कभी देख भी नही पाया
अपनी पूरी जिन्दगी मे!
रोशनी को अलविदा कह दिया था मैने
तेल, कोयले और
अन्धेरी गुफ़ाओ मे मिलने वाले
इन अजीबो-गरीब पत्थरो के लिये.
और देखो,
आज फिर से जान गवायी है मैने
तुम्हारे उसी वहशी लालच की खातिर
अपने उन्ही भाइयो के हाथो
जो सदियो पहले
तुम्हारी जन्जीरो को तोड़
उठ खडे हुए थे – स्पार्ट्कस के साथ..

April 7, 2010

कोने

Filed under: Literature — movementofthought @ 4:56 pm

किसलय

चारदीवारी के अन्दर
भटकता हू गोल-गोल
गोल-गोल, गोल-गोल.
दीवारो से टकराता हूं
बार-बार, बार-बार.
थकता हूं, बैठ जाता हूं
कोने मे चुपचाप.
अच्छे लगने लगते हैं
-कोने भी.
पूछता हूं कोनो से
-पूरी आत्मीयता से
चार ही क्यो है वे?
ज्यादा क्यो नही?
प्यार से समझाते है कोने
-हम तो है तभी तक
जब तक है ये दीवारे.
जितनी दीवारे – उतने कोने !

March 28, 2010

Terror incognito

Filed under: Books — movementofthought @ 2:31 pm

In 2006, Amitava Kumar went to Walavati, south of Mumbai, to report the case of an accused terrorist, Iqbal Haspatel, whom he later wrote about in Time Out. Kumar, a writer who teaches English at Vassar College, had already explored the dark world of Islamophobia in Husband of a Fanatic, prompted by his marriage to a Pakistani Muslim. In his new book, Evidence of Suspicion, he goes a step further in asking why we hate the people we hate, in this case, men accused of terrorism. “Terror is the new fetish,” he told Raghu Karnad. “Its meaning is taken for granted.”

Before you wrote the Haspatel story, you obviously already had strong feelings about the way India prosecutes terrorism.

I decided to go to Walavati and meet the Haspatels because a piece of textile machinery – a bobbin – found in their living room had been mistaken for a projectile. They were tortured for days because the police had made a malicious mistake.
But before that, I had been working on another story, also about terrorism, but in the US. It was the story of Hemant Lakhani, a used-clothing salesman convicted of selling a missile to the FBI. Both illustrated the problems of the war on terror: the state’s desperation to find villains, its ability to produce only victims.

In India there’s a stigma against reporting the fate of terror accused. What is the power of the phrase, “He is a terrorist”?

The punitive state – but also a public guided by the often jingoistic media – can be only a few inches removed from the mentality of a lynch mob. Is everyone innocent? No. SAR Geelani told me that when he ran into one of his torturers, the cop apologised for what they did to him, but wanted Geelani to understand that not everyone was innocent. No, said Geelani, but 95 per cent are.
I’m not here to attribute innocence or culpability. I’m only trying to show how we can’t proceed with identikit images. This book is a writer’s search for particularity and detail.

This is as much a book about torture as it is about terror. What’s the relationship between terror and torture?

Each one of us has received an education in the art of torture in recent years. That’s America’s gift to us, through this war on terror, that we’ve learned words like “waterboarding”. We have also learned that torture isn’t only about force: men lose their minds, not when beaten to within an inch of their lives, but when they are placed in solitary confinement with black-out goggles and noise-blocking headphones wrapped around their heads. We have learned that if terror by non-state actors relies on brutal killing of innocents, then state terror proceeds by making torture justifiable and routine.
2008 was an unsettling year for those trying to understand terror. The courts’ refusal to extend a ban on SIMI, the discovery of Hindu terror networks – there was all this dissonance in the terrorism narrative. Then 26/11 happened. Did it kill an opportunity for more critical thinking?

You’re right. Kasab and his cohort killed all the questions that we were asking about the ways in which Indian authorities had been investigating terror.
The Mumbai attacks hurt more than just those few hundred people. As we saw with 9/11, a blatant attack, spectacularly staged, can become the excuse for unremitting war. Will the trauma of 26/11 allow us to be sceptical of the state’s claims? Most people will say, and rightly so, “What proof do you need? Didn’t you see the Taj on fire?” The attacks have formed something like the primal memory of life in the age of terror. That memory will keep making the nightmare real.

March 16, 2010

हरी दूबें

Filed under: Literature — movementofthought @ 3:37 pm

किसलय

बन्जर धरती की फटती दरारों से
लहराती है नन्ही दूबें
अपने छोटे हाथो को आसमान की तरफ़ उठाये
मानो छू लेना चाहती हों – नीले आसमान को .
सालो हुए सुनायी नही पड़े थे
– पछियों के गीत
जानें कहा उड़ चले थे सभी.
अब तो नंगी ठूठों पर कब्जा है – गिद्धों का
भयावह शान्ती से देखते हैं वें
-मीलो फैली बन्जर, पथरीली धरती को.
दरारों से निकलती नन्ही दूबें
बुलाती हैं – उन पछियों को
जो भटक कर दूर निकल गये थे कहीं
बुलाती हैं – बिखरे हुए बादलों के टुकड़ों को
भटकते थे तन्हा जो सुदूर आसमां में.
भयावह खतरा है हमारी नंगी ठूठों
और बन्जर जमीनों को – इन दूबों से
-चीखते हैं गिद्ध !!
फ़ैलाते है अपने विशालकाय डैने
उगलते है आग अपनी ख़ूनी निगाहों से
इन नन्ही दूबों पर !
लहराती हैं नन्ही दूबें
बुलाती हैं – पछियों, बादलों और हवाओं को.
शायद फ़ूटनें वाली हैं नन्ही कोपलें
गिद्धों के पावों तले – नंगी ठूठों पर.

March 13, 2010

सलाखो के पीछे कैद स्वाधीनता

Filed under: Politics — movementofthought @ 7:17 am

[This article was originally published on http://naipirhi.blogspot.com ]

-नीलाभ

इरादा तो आज था कि अभय ने अपने ब्लौग– निर्मल आनन्द– में जो सवाल उठाया है : हिन्दी में सितारा कौन है ? — उस पर कुछ विचार किया जाये, लेकिन आज एक ऐसी बात हुई कि आप से किसी और विषय की चर्चा करने को मन हो आया है.
आज हमारी युवा मित्र सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय की १४ दिन की रिमाण्ड की अवधि पूरी हो रही थी और उन्हें पुलिस फिर से रिमाण्ड में लेने के लिये अदालत में पेश करने नैनी जैल से लाने वाली थी. बात को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि सीमा आज़ाद मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. से सम्बद्ध हैं, साथ ही द्वैमासिक पत्रिका “दस्तक” की सम्पादक हैं और उनके पति विश्वविजय वामपन्थी रुझान वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अपनी पत्रिका “दस्तक” में सीमा लगातार मौजूदा जनविरोधी सरकार की मुखर आलोचना करती रही है. सीमा ने पत्रिका का सम्पादन करने के साथ-साथ सरकार के बहुत-से क़दमों का कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं. इनमें गंगा एक्सप्रेस-वे, कानपुर के कपड़ा उद्योग और नौगढ़ में पुलिसिया दमन से सम्बन्धित पुस्तिकाएं बहुत चर्चित रही हैं. हाल ही में, १९ जनवरी को सीमा ने गृह मन्त्री पी चिदम्बरम के कुख्यात “औपरेशन ग्रीनहण्ट” के खिलाफ़ लेखों का एक संग्रह प्रकाशित किया. ज़ाहिर है, इन सारी वजहों से सरकार की नज़र सीमा पर थी और ६ तारीख़ को पुलिस ने सीमा और विश्वविजय को गिरफ़्तार कर लिया और जैसा कि दसियों मामलों में देखा गया है उनसे झूठी बरामदगियां दिखा कर उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा दिया.
वैसे यह कोई नयी बात नहीं है. जनविरोधी सरकारें सदा से यही करती आयी हैं. हाल के दिनों में मौजूदा सत्ताधारी कौंग्रेस ने जिस तरह देश को बड़े पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों गिरवी रखने के लिये क़रार किये हैं और कलिंगनगर, सिंगुर, नन्दीग्राम, लालगढ़, और बस्तर और झारखण्ड के आदिवासियों को बेदखल करना शुरू किया है, वह किसी भी तरह की आलोचना को सहन करने के मूड में नहीं है. और इसीलिये हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र को लम्बा अवकाश दे कर अपनी नीतियों के विरोधियों को कभी “आतंकवादी” और कभी “नक्सलवादी” या “माओवादी” घोषित करके जेल की सलाखों के पीछे ठूंसने का वही फ़र्रुख़ाबादी खेल खेलने लगी है. इस खेल में सब कुछ जायज़ है — हर तरह का झूठ, हर तरह का फ़रेब और हर तरह का दमन. और इस फ़रेब में सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है हमारा बिका हुआ मीडिया. इसीलिए हैरत नहीं हुई कि सीमा की गिरफ़्तारी के बाद अख़बारों ने हर तरह की अतिरंजित सनसनीख़ेज़ ख़बरें छापीं कि ट्रक भर कर नक्सलवादी साहित्य बरामद हुआ है, कि सीमा माओवादियों की “डेनकीपर” (आश्रयदाता) थी और विश्वविजय माओवादियों के कमाण्डर हैं. यही नहीं, पुलिस और अख़बारों ने मिल कर ऐसा ख़ौफ़ का वातावरण पैदा करने की कोशिश भी की जिस से सीमा के परिवार और मित्रों का मनोबल टूट जाये.
अभय ने अपने ब्लौग मॆं पुस्तक मेले का ज़िक्र किया है. मज़े की बात है कि पांच फ़रवरी को उसी पुस्तक मेले में अभय, मैं और सीमा साथ थे और जिस साहित्य को पुलिस और अख़बार नक्सलवादी बता रहे हैं वे पुस्तक मेले से ख़रीदी गयी किताबें थीं.
बहरहाल, आज की तरफ़ लौटें तो सीमा और विश्वविजय की रिमाण्ड के चौदह दिन आज पूरे हो रहे थे और आज दोनों को अदालत में पेश होना था. हम ग्यारह बजे ही अदालत पहुंच गये. लगभग दो घण्टे के इन्तज़ार के बाद सीमा और विश्वविजय को अदालत में लाया गया. मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि दोनों इन चौदह दिनों में थोड़े दुबले भले ही हो गये थे लेकिन दोनों का मनोबल ऊंचा था. सीमा के चेहरे पर एक दृढ़्ता थी और विश्वविजय के चेहरे पर मुस्कान. सीमा हमेशा की तरह मुस्कराती हुई आयी और उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. लगा जैसे सलाख़ों के पीछे क़ैद स्वाधीनता चली आ रही हो.
हम लोग काफ़ी देर तक सीमा से बातें करते रहे, बिना फ़िकर किये कि सरकार के तमाम गुप्तचर किसी-न-किसी बहाने से आस-पास मंडरा रहे थे और . जब हम आने लगे तो सीमा ने ख़ास तौर पर ज़ोर दे कर कहा कि उसे तो बयान देने की इजाज़त नहीं है, इसलिए वह पुलिस और मीडिया के झूठ का पर्दाफ़ाश नहीं कर पा रही, लेकिन मैं सब को बता दूं कि पुलिस की सारी कहानी फ़र्ज़ी है जैसा कि हम बार-बार देख चुके हैं
सो दोस्तो, यह रिसाला जैसा भी उखड़ा-उखड़ा है सीमा की बात आप सब तक पहुंचाने के लिए भेज रहा हूं. सीमा की रिमाण्ड की अर्ज़ी खारिज हो गयी है. २२ तारीख़ को उसे ज़मानत के लिए पेश किया जायेगा और आशंका यही है कि उसे ज़मानत नहीं दी जायेगी. आशंका इस बात की भी है कि स्पेशल टास्क फ़ोर्स सीमा और विश्वविजय को अपनी रिमाण्ड में ले कर पूछ-ताछ करें और जबरन उनसे बयान दिलवायें कि वे ऐसी कार्रवाइयों में लिप्त हैं जिन्हें राजद्रोह के अन्तर्गत रखा जा सकता है. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां सब कुछ सम्भव है– भरपूर दमन और उत्पीड़न भी और जन-जन की मुक्ति का अभियान भी. यह हम पर मुनस्सर है कि हम किस तरफ़ हैं. ज़ाहिर है कि जो मुक्ति के पक्षधर हैं उन्हें अपनी आवाज़ बुलन्द करनी होगी. अर्सा पहले लिखी अपनी कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं :

चुप्पी सबसे बड़ा ख़तरा है ज़िन्दा आदमी के लिए
तुम नहीं जानते वह कब तुम्हारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जायेगी और सर्वधिक सुनायी देगी
तुम देखते हो एक ग़लत बात और ख़ामोश रहते हो
वे यही चाहते हैं और इसीलिए चुप्पी की तारीफ़ करते हैं
वे चुप्पी की तारीफ़ करते हैं लेकिन यह सच है
वे आवाज़ से बेतरह डरते हैं
इसीलिए बोलो,
बोलो अपने हृदय की आवाज़ से आकाश की असमर्थ ख़ामोशी को चीरते हुए
बोलो, नसों में बारूद, बारूद में धमाका,
धमाके मॆं राग और राग में रंग भरते हुए अपने सुर्ख़ ख़ून का
भले ही कानों पर पहरे हों, ज़बानों पर ताले हों, भाषाएं बदल दी गयी हों रातों-रात
आवाज़ अगर सचमुच आवाज़ है तो दब नहीं सकती
वह सतत आज़ाद है

साभार नुक्कड़

February 6, 2010

Nepal Waits as 2 Armies, Former Foes, Become One

Filed under: Politics — movementofthought @ 4:31 am

First published on nytimes.com

By JIM YARDLEY

JHYALTUNGDANDA, Nepal — Up in the foothills of the Himalayas, the soldiers of Nepal’s onetime rebel army have spent more than three years in camps monitored by the United Nations. Mornings begin with exercise, breakfast and drilling. Afternoons often mean political education sessions on their Maoist agenda for restructuring Nepal’s government.

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Times Topics: Nepal

Kuni Takahashi for The New York Times

Nepalese Maoist soldiers received blessings from their division commander during their discharge ceremony at a camp in Nawalparasi.

Kuni Takahashi for The New York Times

At a cantonment of Nepalese Maoist soldiers, Pushpa Kamal Dahal, a Maoist leader also known as Prachanda, was pictured on a wall poster.

The New York Times

A camp monitored by the United Nations houses Maoist soldiers.

But, more than anything, the Maoist fighters are simply waiting, and Nepal is waiting with them, because the fate of the rebel soldiers will largely determine the fate of the nation.

Within the next four months, Nepal must complete the final and most difficult piece of the 2006 peace agreement that ended the brutal Maoist insurrection by integrating these fighters from the People’s Liberation Army of Nepal into the country’s security forces, including the Nepalese Army.

At the ramshackle headquarters of the Fourth Division of the People’s Liberation Army, soldiers in dingy tracksuits loitered in the compound’s dirt courtyard. Their leader, known as Commander Pratik, smiled when asked if integrating his troops with their enemies would prove difficult. “It is more difficult to fight one another,” he answered.

Perhaps. With Nepal facing a May 28 deadline to restructure its government and approve a new constitution, nothing is posing a greater threat to the peace process than the unresolved task of merging the two enemy armies. Maoist leaders and Nepalese political parties have alternately bickered and dithered, with Maoists stalling the dismantling of their army while negotiations go on about how to revise the Constitution.

As a result, Nepal is grasping for a lasting peace, trying to overcome the legacy of a war that has left it more militarized than ever. The 19,602 Maoist soldiers continue to train, even as they remain quarantined in the United Nations camps, or cantonments. The Nepalese Army is twice as large today, with 96,000 soldiers, as it was when the guerrilla war began, and the number of police and paramilitary police officers has steadily risen to roughly 80,000.

“How can you have one country with two armies?” asked Kul Chandra Gautam, a former United Nations diplomat and native Nepali who has consulted with different parties in the peace process. “A country like Nepal does not need 200,000 security personnel. That’s more than all the country’s civil servants combined, minus teachers.”

Nepal cannot begin to rebuild its tattered economy until the military standoff is eased, which first means finding a solution on integration.

On a recent morning, a ceremony at the United Nations cantonment that houses the Maoist Fourth Division underscored the uncertainty ahead, even if it was a small sign of progress.

Sitting in rows of plastic chairs, 361 male and female soldiers were being discharged from the Maoist army and returned to civilian life. The United Nations had listed them among the 4,008 Maoist rebels deemed ineligible to enter the Nepalese security forces, either because they were minors at the time of the May 2006 cease-fire or had joined the Maoist army after that date.

Pernille Ironside, a child protection specialist with Unicef, said the majority of these “disqualified” soldiers had joined the Maoists as minors, a violation of international law, and had grown into adulthood as guerrilla fighters. Yet unlike many child soldiers in Africa, who are often abducted or coerced into fighting, many of those who joined the Maoists did so voluntarily, making the job of integrating them into Nepalese society a different challenge.

“In some ways, this is more challenging because these children don’t want to leave,” Ms. Ironside said. “They’ve found a kind of family and something to believe in.”

Even though the Maoist soldiers have remained in the cantonments for three years, the terms of the peace deal have tightly restricted access to them by United Nations caseworkers, allowing almost no opportunities to interview or counsel them. Instead, the soldiers have been subjected to regular political education sessions on Maoist dogma, something that may make their re-entry into society even harder.

Under the peace agreement, the Maoists turned over most of their weapons for storage in United Nations-monitored containers, but kept enough to continue training. “During the war, we couldn’t have organized training,” Commander Pratik said. “But since we came here, we’ve been able to train. Now, we are more professional.”

The mistrust surrounding the integration is pervasive on all sides. Many analysts say the Maoists have maneuvered to keep their army intact as a bargaining chip to influence the constitutional negotiations.

At the same time, the Nepalese Army, which before 2006 answered to the king, now deposed, has grudgingly succumbed to civilian control. In January, the defense minister announced that the army was not obligated to accept Maoist soldiers and should be included in civilian negotiations over integration — comments rejected by the prime minister and seized upon by Maoists as evidence of bad faith by the government.

The discharge of disqualified soldiers was supposed to have been a relatively easy first step to begin the integration process. The soldiers being discharged at the Fourth Division ceremony were eligible to leave two years ago, but Maoist leaders rejected the rehabilitation package and demanded large cash payments for every departing soldier.

Those demands were rejected, and Maoists agreed to proceed with the discharges only in late 2009, with caveats. Now departing soldiers must call a United Nations hot line after they leave to personally request a rehabilitation package that includes educational support, business and vocational training, and financial help to start a business.

But many of the departing soldiers derided the package, some saying they were too old to return to school, others saying they were already soldiers and did not need any other training.

Indeed, as the Maoists continue to argue with the government over the terms of integrating the armies, Maoist leaders are trying to keep the allegiance of the 4,008 soldiers now being discharged to civilian life.

“We are connected in our hearts,” Commander Pratik declared in his farewell speech to the discharged soldiers. “Until there is a complete social and economic reconstruction of Nepal, and a complete restructuring of Nepal, I hope you will continue to help in the revolution from outside.”

February 4, 2010

“There is no Constitution in Chhattisgarh anymore”

Filed under: Politics — movementofthought @ 10:33 am

Do you know that one part of our ‘great democratic country’ is totally under arrest? Yes, chattisgarh has become a police state. Thanks to green hunt, people, specially tribal people are most valnerable to the police and paramilitary brutalities. And because of embeded media, relevent news are totally blacked out. Thanks to some courageous journalist , some lighting is there. Read this news and think in which condition our fellow-citizen are forced to live…..

It was first published in ‘Hard News’……..Editor

 

Anybody can be picked up, branded as Maoist and jailed, beaten up, smashed, charged with dubious cases, ordinary people are killed, tribal women get raped and assaulted, no peaceful protests are allowed, journalists, academics and filmmakers are followed, terrorised and not allowed to go inside villages, a general reign of fear stalks this poverty-stricken landscape
Harsh Dobhal Dantewada/Delhi

Nobody knows the whereabouts of Sodi Sambho, a 28-year-old tribal lady who was brutally attacked by CRPF jawans of the Cobra Battalion, SPOs (special police officers) and members of Salwa Judum (State-sponsored militia against the Maoists in Chhattisgarh) when they descended on her village Gompad in tehsil Konta of Dantewada district on October 1, 2009. “An 80-year-old visually handicapped man was stabbed on his back, a 70-year-old woman, unable to walk, was killed, along with a 25-year-old youngster and two girls of 8 and 12. Four people who were passing by were shot dead. Nine people were killed that day,” said Himanshu Kumar, a Gandhian activist involved in social work in Dantewada, currently hounded by the police, his life in constant danger.

Sodi Sambho was in her house, cleaning the courtyard. Two of her four children were at home when she was asked to stand with another woman who was carrying an infant. Sodi fell as they shot at her leg; her children started crying. Left to bleed, Sodi filed an application with the police with the help of activists, but, predictably, there was no response. She was taken to a hospital in Delhi for treatment where she became a petitioner in the Supreme Court along with 11 others on the infamous ‘Gompad killing case’. Later, when she was again coming to Delhi for treatment, she was stopped at Kanker by the police, 300 km from Dantewada, as she was on her way to Raipur to board a train. She was taken into custody without any arrest warrant.

She had been missing, but the Chhattisgarh police later claimed that she was in Jagdalpur hospital and anyone could meet her. When three days later two journalists went to see her, they were manhandled by the police. The Supreme Court then ordered that she should be brought to Delhi for treatment. She arrived in AIIMS but was kept in ‘prison-like’ conditions by the Chhattisgarh armed state police. Arundhati Roy and women academics from JNU, Jamia and Delhi University tried to meet her, but the police bluntly refused. Why? Is she a terrorist? And why can’t she meet people, including her lawyer?

When the SC again ordered that Sodi’s advocate could meet her, they it was shockingly found that she had been “discharged”. In police custody at the hospital, Sodi simply disappeared. At the time of writing, nobody knows where she is, while the Chhattisgarh police and administration refuse to divulge any details. Her legal status remains uncertain as she is in police custody but the same has not been admitted.

If this is not a viciously undemocratic Police State in BJP-ruled Chhattisgarh, then what is it? The armed assault against the Maoists has been corrupted into organised State terrorism anybody can be picked up, branded as Maoist and jailed, beaten up, smashed and charged with dubious cases. Ordinary people are killed, tribal women get raped and assaulted, no peaceful protests are allowed, journalists, academics and filmmakers are followed, terrorised and not allowed to go inside villages, a general reign of fear stalks this poverty-stricken landscape. If the state government and the Union home ministry are targeting Maoist guerrillas, who are anyway inaccessible in deep forests, then whey are they hounding non-violent tribals, Gandhians, activists, lawyers, journalists, students and academics from all over the country? Why are they blocking all constitutional and legally legitimate processes? What are they afraid of? What are they hiding?

Lingaram is a 24-year-old youngster from village Sameli who was picked up and kept in a bathroom for 40 days without any charge. He was pressurised to join as an SPO, and tortured mercilessly upon refusal. The police had to produce him in the Bilaspur High Court after a habeas corpus was filed; the HC ordered his release. “I was told by the police not to speak the truth in front of the judge, or else I would be killed,” he said. Lingaram obliged, and fled for his life. He is in Delhi now and is desperate to go back. The police has since picked up his brother, father and other villagers asking them to produce him.

Activists Medha Patkar, Sandeep Pandey, Kavita Srivastava and others were pelted with eggs, stones and sewage by an organised mob of non-tribals on January 7 when they were on their way to meet the SP of Dantewada. “Maowadi wapas jao, Medha Patkar wapas jao,” they shouted. The police watched with silent delight. Clearly, this was stage-managed  because none of these leaders has even any remote links with the Maoists.

Four victims raped by the SPOs are still awaiting justice. Their complaints were filed after six months and warrants issued against the accused. “But the victims were again picked up by the same accused from their houses and kept in custody for five days,” said Himanshu.

A young lawyer, Alban Toppo, who had accompanied a social activist Kopa Kunjam to the police station, was detained and tortured before he was released next day. Kopa has been falsely charged with murder and is languishing in jail.

“Operation Greenhunt goes on. I have just received the news that six persons were killed in yet another village,” said Himanshu. All his Gandhian associates have been arrested and his ashram demolished. “There is no democracy or Constitution in Chhattisgarh anymore,” he said

January 29, 2010

Howard Zinn: Good-bye Old Friend

Filed under: History — movementofthought @ 7:34 am

Howard Zinn, a renowned Peoples’  Historian, an activist, a sound marxist passed away at the age of 87. Here is a article on Him and His contribution to the humanity. It was first published on Kasamaproject.org…..Editor

 Who told the unknown stories of the people? Who dared enter Mississippi in the days of the lynching tree? Who spoke out against war after war after war? Who skewered the lies of the rich and imperial? Who taught rooms filled with eager young faces, year after year? Who signed every petition, spoke out against every injustice? Who helped invent the teach-in and the people’s history? Who studied, and wrote, and spoke tirelessly for those who could not read, or write, or be heard? Howard Zinn did. And now he is gone. Who among his countless students, comrades and friends will now step to the podium? Who will now fill his place? How many of us will it take? Good-bye old friend. We miss you already. * * * * * * * This was originally posted on boston.com. Howard Zinn, historian who challenged status quo, dies at 87 By Mark Feeney, Globe Staff Howard Zinn, the Boston University historian and political activist who was an early opponent of US involvement in Vietnam and a leading faculty critic of BU president John Silber, died of a heart attack today in Santa Monica, Calif, where he was traveling, his family said. He was 87. “His writings have changed the consciousness of a generation, and helped open new paths to understanding and its crucial meaning for our lives,” Noam Chomsky, the left-wing activist and MIT professor, once wrote of Dr. Zinn. “When action has been called for, one could always be confident that he would be on the front lines, an example and trustworthy guide.” For Dr. Zinn, activism was a natural extension of the revisionist brand of history he taught. Dr. Zinn’s best-known book, “A People’s History of the United States” (1980), had for its heroes not the Founding Fathers — many of them slaveholders and deeply attached to the status quo, as Dr. Zinn was quick to point out — but rather the farmers of Shays’ Rebellion and the union organizers of the 1930s. As he wrote in his autobiography, “You Can’t Be Neutral on a Moving Train” (1994), “From the start, my teaching was infused with my own history. I would try to be fair to other points of view, but I wanted more than ‘objectivity’; I wanted students to leave my classes not just better informed, but more prepared to relinquish the safety of silence, more prepared to speak up, to act against injustice wherever they saw it. This, of course, was a recipe for trouble.” Certainly, it was a recipe for rancor between Dr. Zinn and Silber. Dr. Zinn twice helped lead faculty votes to oust the BU president, who in turn once accused Dr. Zinn of arson (a charge he quickly retracted) and cited him as a prime example of teachers “who poison the well of academe.” Dr. Zinn was a cochairman of the strike committee when BU professors walked out in 1979. After the strike was settled, he and four colleagues were charged with violating their contract when they refused to cross a picket line of striking secretaries. The charges against “the BU Five” were soon dropped, however. Dr. Zinn was born in New York City on Aug. 24, 1922, the son of Jewish immigrants, Edward Zinn, a waiter, and Jennie (Rabinowitz) Zinn, a housewife. He attended New York public schools and worked in the Brooklyn Navy Yard before joining the Army Air Force during World War II. Serving as a bombardier in the Eighth Air Force, he won the Air Medal and attained the rank of second lieutenant. After the war, Dr. Zinn worked at a series of menial jobs until entering New York University as a 27-year-old freshman on the GI Bill. Professor Zinn, who had married Roslyn Shechter in 1944, worked nights in a warehouse loading trucks to support his studies. He received his bachelor’s degree from NYU, followed by master’s and doctoral degrees in history from Columbia University. Dr. Zinn was an instructor at Upsala College and lecturer at Brooklyn College before joining the faculty of Spelman College in Atlanta, in 1956. He served at the historically black women’s institution as chairman of the history department. Among his students were the novelist Alice Walker, who called him “the best teacher I ever had,” and Marian Wright Edelman, future head of the Children’s Defense Fund. During this time, Dr. Zinn became active in the civil rights movement. He served on the executive committee of the Student Nonviolent Coordinating Committee, the most aggressive civil rights organization of the time, and participated in numerous demonstrations. Dr. Zinn became an associate professor of political science at BU in 1964 and was named full professor in 1966. The focus of his activism now became the Vietnam War. Dr. Zinn spoke at countless rallies and teach-ins and drew national attention when he and another leading antiwar activist, Rev. Daniel Berrigan, went to Hanoi in 1968 to receive three prisoners released by the North Vietnamese. Dr. Zinn’s involvement in the antiwar movement led to his publishing two books: “Vietnam: The Logic of Withdrawal” (1967) and “Disobedience and Democracy” (1968). He had previously published “LaGuardia in Congress” (1959), which had won the American Historical Association’s Albert J. Beveridge Prize; “SNCC: The New Abolitionists” (1964); “The Southern Mystique” (1964); and “New Deal Thought” (1966). Dr. Zinn was also the author of “The Politics of History” (1970); “Postwar America” (1973); “Justice in Everyday Life” (1974); and “Declarations of Independence” (1990). In 1988, Dr. Zinn took early retirement so as to concentrate on speaking and writing. The latter activity included writing for the stage. Dr. Zinn had two plays produced: “Emma,” about the anarchist leader Emma Goldman, and “Daughter of Venus.” Dr. Zinn, or his writing, made a cameo appearance in the 1997 film ‘‘Good Will Hunting.’’ The title characters, played by Matt Damon, lauds ‘‘A People’s History’’ and urges Robin Williams’s character to read it. Damon, who co-wrote the script, was a neighbor of the Zinns growing up. Damon was later involved in a television version of the book, ‘‘The People Speak,’’ which ran on the History Channel in 2009. Damon was the narrator of a 2004 biographical documentary, ‘‘Howard Zinn: You Can’t Be Neutral on a Moving Train.’’ On his last day at BU, Dr. Zinn ended class 30 minutes early so he could join a picket line and urged the 500 students attending his lecture to come along. A hundred did so. Dr. Zinn’s wife died in 2008. He leaves a daughter, Myla Kabat-Zinn of Lexington; a son, Jeff of Wellfleet; three granddaugthers; and two grandsons. Funeral plans were not available

January 22, 2010

यह रेखा ग़रीबों की गरदन से गुज़रती है

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garibi rekhaउन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ग़रीब लोग आलसी होते हैं, काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है। इसी आधार पर उनका तर्क था कि गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के ज़रिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये। दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। जिस व्यवस्था के लिये ग़रीब सिर्फ़ बोझ हैं और देश-दुनिया के सारे संसाधनों पर सिर्फ़ पूंजीपति वर्ग का अधिकार है और जिसके मूल में ही असमानता का विमर्श अंतर्निहित है। यह व्यवस्था सीधे-सीधे समाज को दो हिस्सों में बांटती है, पहला जिसके पास संसाधनों का स्वामित्व है और दूसरा जो उसके हित में उसके लाभ की वृद्धि के लिये काम करने के बदले अपनी आजीविका कमाता है। ऐसे में लाभ को अधिकतम करने का मोह अपने कामगारों की विशाल आबादी को बस उतना ही देने के लिये प्रेरित करता है जितने से वह ज़िन्दा रह सके और उसके लिये काम कर सके। यह विचार सरणी ग़रीबी के लिये ग़रीबों को ही ज़िम्मेदार ठहराती है और इस तथ्य को छिपाती है कि पूंजीवादी विकास प्रक्रिया के मूल में ही आबादी के बड़े हिस्से का निरंतर विपन्न होते जाना अंतर्निहित है। सिमोन द बोऊवा ने पितृसत्तात्मक समाज में औरत के बारे में जो कहा था वही पूंजीवादी समाज में ग़रीब के लिये कहा जा सकता है – ग़रीब पैदा नहीं होते बनाये जाते हैं! जिस तरह लाभ और पूंजी का लगातार सीमित हाथों में संकेन्द्रीकरण होता है उसमे स्वाभाविक ही है कि आबादी के बड़े हिस्से से उसकी मिल्कियत छीनकर उसे सर्वहारा में तब्दील कर दिया जाये। अपने देश में सेज़ और ऐसी ही तमाम परियोजनाओं के नाम पर ज़मीनों पर बेतहाशा कब्ज़ा , कृषि के कारपोरेटीकरण द्वारा छोटे और मध्यम किसानों के विनाश और श्रम क़ानूनों में ढील के नाम पर श्रमिक की असुरक्षा में भयावह वृद्धि जैसी समकालीन प्रक्रियाओं में इस लाक्षणिकता को आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में रूस सहित कई देशों में समाजवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना और पूरी दुनिया में समाजवाद की एक विचार के रूप में प्रतिष्ठा तथा तद्जन्य सामाजिक- राजनैतिक आलोड़नों के बरअक्स पूंजीवाद के लिये मानवीय चेहरा अपनाना आवश्यक हो गया था। फिर भी तीस के दशक की महामंदी के दौर में क्लासिकल अर्थव्यवस्था के लैसेज़ फ़ेयरे ( सरकार के हस्तक्षेप से पूर्णतः मुक्त बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था) सिद्धांत को तिलांजलि देकर कीन्स की राज्य हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों का लागू किया जाना पूरी दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्थाओं की मज़बूरियों को प्रदर्शित करता था न कि उनकी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं में किसी परिवर्तन को। मंदी से उबरने के साथ ही जब कालांतर में पूंजीवाद ने ख़ुद को फिर मज़बूत किया तो इस सैद्धांतिक अवस्थिति में भी परिवर्तन हुआ और पाल ए सैमुएल्सन जैसे सिद्धांतकारों ने कीन्सीय तथा क्लासिकीय सिद्धांतो के घालमेल से नवक्लासिकीय सिंथेसिस की जिस अवधारणा को जन्म दिया था उसकी तार्किक परिणिति नव उदारवादी सिद्धांतों की पुनर्स्थापना के रूप में होनी तय थी। भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के तहत कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई थी वह नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद लागू संरचनात्मक संयोजन वाली नई आर्थिक नीतियों से प्रतिस्थापित कर दी गयी। वैसे यह कल्याणकारी राज्य भी मूलतः पूंजीपति वर्ग के कल्याण के लिये ही था। असल में, कीन्स ने मांग की कमी को मंदी का मुख्य कारण माना था। उसका मानना था कि जे बी से का नियम (जो कुछ उत्पादित हुआ है उसके लिये मांग भी है) अर्थव्यवस्था में लागू नहीं होता। लोगों के पास बाज़ार में उपलब्ध सामान ख़रीदने के लिये पैसे नहीं होते तो प्रभावी मांग घटने लगती है जिससे कालांतर में क़ीमतें गिरने लगती हैं और अंततः मंदी की स्थितियां उतपन्न होती हैं। इसीलिये उनका सुझाव था कि सरकारों को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों की क्रय शक्ति को एक न्यूनतम स्तर पर बनाये रखना चाहिये। स्पष्ट तौर पर इस कल्याण में आर्थिक असमानता को दूर करने या फिर एक समतामूलक समाज की स्थापना का प्रस्ताव नहीं था। पूरा ज़ोर पूंजीवादी व्यवस्था को जीवित रखकर उत्पादकों के लिये स्थायी बाज़ार उपलब्ध कराना ही था। समाजवाद के तत्कालीन प्रभाव के चलते इन्हीं नीतियों को भारत सहित कई देशों में समाजवादी कहा गया जो निश्चित तौर पर सरकारों की आम जनता के पक्ष में नहीं अपितु पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता का ही परिचायक था।

लेकिन नब्बे के दशक में यह आवरण अब और ज़रूरी नहीं रहा और नयी आर्थिक नीतियों के नाम पर जो नीतियां लागू कीं गईं उनके तहत ग़रीबों तथा वंचितों को दी जाने वाली तमाम सुविधायें धीरे-धीरे छीनी जाने लगीं। पश्चिमी देशों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरु हो चुकी थी। उदाहरण के लिये मार्ग्रेट थैचर ले शासनकाल में 1980 में पेंशन निर्धारण के लिये औसत आय का आधार समाप्त कर दिया गया और 1987-88 में बच्चों पर मिलने वाली सुविधायें। इसके परिणाम भी उसी दौर में आने लगे थे – 1979 से 1997 के बीच ब्रिटेन में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई अभूतपूर्व रूप से बढ गयी। यह दौर एक ध्रुवीय होते जा रहे विश्व में पूंजीवादी समाज की सोच, प्रतिबद्धता और आक्रामकता के नग्नतम रूप में सामने आने का दौर था।

भारत में भी इन नीतियों का प्रसार निश्चित तौर पर सरकारों की बदली प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट प्रतिबिंबन था। इनके विस्तार में जाना तो इस लेख की विषयवस्तु के मद्देनज़र विषयांतर होगा लेकिन यह तो स्पष्ट है ही अपने आरंभिक दौर में कुछ तो मुक्ति आंदोलन और नई-नई मिली आज़ादी का हैंगओवर और कुछ देश-दुनिया में ज़ारी आँदोलन का दबाव में पूँजीवादी नीतियों को भी समाजवाद के मुलम्मे में पेश किये जाने का दौर नब्बे के दशक के आरंभ में ही इतिहास बन गया और साठ के दशक में अमेरिका में विकसित रिसाव के सिद्धांत को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर पूरा ज़ोर निजी पूंजी के विकास पर लगाया गया। आय तथा वितरण की असमानता में विस्तार अब कोई चिंता का विषय नहीं रह गया बल्कि इसे संवृद्धि के लिये आवश्यक मान कर स्वीकार किया गया और गरीबों तथा ज़रूरतमंदों की सहायता के लिये दी जाने वाली राशि को संसाधनों की बर्बादी के रूप में निरूपित किया गया। ग़रीबी हटाने जैसे कास्मेटिक नारे भी अब अतीत की बात बन गये। ऐसे में यह अनपेक्षित नहीं था कि पिछले दिनों जब भारत में ग़रीबी रेखा पर बहस के दौरान तमाम अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक रूप से गरीबों की संख्या आधिकारिक आकड़ों से कई गुना बताई तो तर्क दिये गये कि अगर ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी तो उनके कल्याण के लिये लागू योजनाओं में धन का अतिरिक्त आवण्टन करना होगा जिसके लिये सरकार के पास पैसा नहीं है (सक्सेना समिति को लिखे गये योजना आयोग के पत्र से)! इसी सरकार के पास पिछले वर्ष पूँजीपतियों को विभिन्न सहायता और छूट के रूप में करोड़ रुपये देने के लिये पर्याप्त धन था!

ग़रीबी रेखा के रूप में ग़रीबी को निर्धारित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 1957 में इण्डियन लेबर कांफ्रेंस के दौरान दिया गया था। उसी के बाद योजना आयोग ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसने भारत के लिये आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा पर आधारित ग़रीबी रेखा का प्रस्ताव किया। इसके तहत उस समय बीस रुपये प्रतिमाह को विभाजक रेखा के रूप में स्वीकृत किया गया। 1979 में योजना आयोग ने ही ग़रीबी को पुनर्परिभाषित करने करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। लेकिन इसने भी मामूली फेरबदल के साथ मूलतः आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को ही आधार बनाया। 1973 की क़ीमतों को आधार बनाते हुए इसने ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 49 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्रों के लिये 57 रुपये की विभाजक रेखा तय की। मुद्रास्फीति के अनुसार इसमें समय-समय पर समायोजन किया गया और वर्तमान में यह शहरी क्षेत्रों के लिये 559 रुपये और गाँवों के लिये 368 रुपये है। योजना आयोग गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर एन एस एस ओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर विभाजक रेखा तय करता है। 2004-2005 के लिये प्रोफेसर लकड़वाला की अध्यक्षता में 1997 में बने एक्स्पर्ट ग्रुप द्वारा की गयी अनुशंसा के आधार पर जो आंकड़े निकाले गये थे उनके अनुसार देश में उस समय ग़रीबों की कुल संख्या 28।3 प्रतिशत थी।

सेन्टर फार पालिसी आल्टरनेटिव की एक रिपोर्ट में मोहन गुरुस्वामी और रोनाल्ड जोसेफ़ एब्राहम इस ग़रीबी रेखा को भूखमरी रेखा कहते हैं। कारण साफ़ है। इसके निर्धारण का इकलौता आधार आवश्यक कैलोरी उपभोग है। यानि इसके अनुसार वह आदमी गरीब नहीं है जो येन के प्रकारेण दो जून अपना पेट भर ले और अगले दिन काम करने के लिये ज़िन्दा रहे। युनिसेफ़ स्वस्थ शरीर के लिये प्रोटीन, वसा, लवण, लौह और विटामिन जैसे तमाम अन्य तत्वों को ज़रूरी बताता है जिसके अभाव में मनुष्य कुपोषित रह जाता है तथा उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमतायें प्रभावित होती हैं। लेकिन ग़रीबी रेखा तो केवल ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी भोजन से आगे नहीं बढ़ती। इसके अलावा शायद व्यवस्था यह मानकर चलती है कि आबादी के इस हिस्से का स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, घर, साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं पर तो कोई हक़ नहीं है। वैसे तो जिस आवश्यक कैलोरी उपभोग की बात की जाती है ( शहरों में 2100 तथा गांवों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन) वह भी दिन भर शारीरिक श्रम करने वालों के लिहाज़ से अपर्याप्त है। इण्डियन काउंसिल आफ़ मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारी काम में लगे हुए पुरुषों को 3800 कैलोरी तथा महिलाओं को प्रतिदिन 2925 कैलोरी की आवश्यकता है। यही नहीं, अनाज़ों की क़ीमतों में तुलनात्मक वृद्धि व उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की घटती भागीदारी, विस्थापन तथा तमाम ऐसी ही दूसरी परिघटनाओं की रोशनी में यह रेखा आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज को जिन दो हिस्सों में बांटती है उसमें ऊपरी हिस्से के निचले आधारों में एक बहुत बड़ी आबादी भयावह ग़रीबी और वंचना का जीवन जीने के लिये मज़बूर है और तमाम सरकारी योजनायें उसको लाभार्थियों की श्रेणी से उसके आधिकारिक तौर पर ग़रीब न होने के कारण बाहर कर देती है।

इसी वज़ह से भारत सरकार के ग़रीबी के आधिकारिक आंकड़े हमेशा से विवाद में रहे हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय तथा दूसरी स्वतंत्र संस्थाओं के अध्ययनों में देश में वास्तविक ग़रीबों की संख्या के आंकड़े सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा रहे हैं। अभी हाल ही में विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009 नाम से ज़ारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 में भारत की एक तिहाई आबादी बेहद ग़रीबी ( 1।25 डालर यानि लगभग 60 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति से भी कम आय) में गुज़ारा कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति सब सहारा देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में सबसे बद्तर होगी। यही नहीं, यह रिपोर्ट भारत की तुलनात्मक स्थिति के लगातार बद्तर होते जाने की ओर भी इशारा करती है। इसके अनुसार जहां 1990 में भारत की स्थिति चीन से बेहतर थी वहीं 2005 में जहां चीन में ग़रीबों का प्रतिशत 15।9 रह गया, भारत में यह बढ़कर 41।6 हो गया।

इन्हीं विसंगतियों के मद्देनज़र पिछले दिनों सरकार ने ग़रीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के लिये जो नयी क़वायदें शुरु कीं उन्होंने इस ज़िन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। सबसे पहले आई असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (अर्जुन सेनगुप्ता समिति) की रिपोर्ट ने देश में तहलका ही मचा दिया था। इसके अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज़ से कम में गुज़ारा करती है। दो अंको वाली संवृद्धि दर और शाईनिंग इण्डिया के दौर में यह आंकड़ा सच्चाई के घिनौने चेहरे से नक़ाब खींचकर उतार देने वाला था। समिति ने असंगठित क्षेत्र के लिये दी जाने वाली सुविधायें इस आबादी तक पहुंचाने की सिफ़ारिश की थी। लेकिन बात यहीं पर ख़त्म नहीं हुई। भारत सरकार द्वारा ग़रीबी रेखा के निर्धारण के लिये मानक तैयार करने के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री एन के सक्सेना की अध्यक्षता में जो समिति बनाई थी उसके आंकड़े और भी चौंकाने वाले थे। इस समिति ने अगस्त-2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में ग़रीबी रेखा से ऊपर रहने वालों के विभाजन के लिये पांच मानक सुझाये। जिसमें शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम 1000 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम 700 रुपयों का उपभोग या पक्के घर या दो पहिया वाहन या मशीनीकृत कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर या ज़िले की औसत प्रतिव्यक्ति भू संपति का स्वामित्व। इस आधार पर समिति पर गरीबी रेखा के निर्धारण पर समिति ने पाया कि भारत की ग्रामीण जनसंख्या का कम से कम पचास फ़ीसदी इसके नीचे जीवनयापन कर रहा है। सक्सेना समिति ने खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों का भी ज़िक्र किया है जिसके अनुसार गांवों में 10।5 करोड़ बीपीएल राशन कार्ड हैं। अगर इसी को आधार बनाया जाय तो भी गांवों में ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या लगभग 53 करोड़ ठहरती है जो कुल आबादी का लगभग पचास फ़ीसदी है।

समिति का यह भी मानना कि जहां आधिकारिक तौर पर 1973-74 से 2004-05 के बीच ग़रीबी 56 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गयी वहीं ग़रीबों की वास्तविक संख्या में कोई कमी नहीं आयी। अपने निष्कर्ष में वह कहते हैं कि ग़रीब परिवारों की एक बहुत बड़ी संख्या ग़रीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों से बहिष्कृत रही है और ये निश्चित रूप से सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले बेज़ुबान लोग ही होंगे।

लेकिन सरकार ने इस समिति की अनुशंसाओं को लागू करने से साफ़ इंकार कर दिया। योजना आयोग द्वारा समिति को लिखे गये पत्र का ज़िक्र पहले ही किया जा चुका है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री सी पी जोशी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि सक्सेना समिति को ग़रीबों की गणना करने के लिये नहीं सिर्फ़ ग़रीबों की पहचान करने के लिये नयी प्रणाली विकसित करने के लिये कहा गया था।

इस दौरान योजना आयोग के एक सदस्य अभिजीत सेन ने तर्क दिया था कि ग़रीबों की गणना आवश्यक कैलोरी उपभोग की जगह आय के आधार की जानी जानी चाहिये। उनका यह भी मानना था कि मौज़ूदा मानकों के आधार पर गणना से शहरी क्षेत्रों में ग़रीबों की वास्तविक संख्या 64 फ़ीसदी तथा गांवों में अस्सी फ़ीसदी है।

इस संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर समिति को ग़रीबों की संख्या की गणना की ज़िम्मेदारी दी गयी थी। इस आयोग की पिछले महीनें प्रस्तुत समिति की रिपोर्ट एक तरफ़ तो आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली परिभाषा से आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ़ आंकड़ों में ग़रीबी कम रखने का दबाव भी इस पर साफ़ दिखाई देता है।

तेंदुलकर समिति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल आबादी का 37 2 फीसदी हिस्सा ग़रीबी रेखा के नीचे है। यह आंकड़ा योजना आयोग के 27 5 फीसदी से तो अधिक है लेकिन अभिजित सेन कमेटी या ऐसे अन्य अध्ययनों के निष्कर्षों से कम। हालांकि योजना आयोग से इसकी सीधी तुलना मानकों के परिवर्तन के कारण संभव नहीं है। आयोग के अनुसार बिहार तथा उड़ीसा में ग्रामीण ग़रीबी का प्रतिशत क्रमशः 55 7 तथा 60 8 है, उल्लेखनीय है कि सेन कमेटी के अनुसार इन दोनों प्रदेशों में ग्रामीण ग़रीबी का प्रतिशत 80 से अधिक था। आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी निर्धारण के लिये सीमारेखा 356 30 से बढ़ाकर 444 68 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 538 60 रुपये से बढ़ाकर 578 80 की है। इस आधार पर दैनिक उपभोग की राशि शहरों में लगभग 19 रुपये और गांवों में लगभग 15 रुपये ठहरती है जो विश्वबैंक द्वारा तय की गयी अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा (20 रुपये) से कम है।

समिति ने आवश्यक कैलोरी वाले मानक को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसकी जगह पर समिति का ज़ोर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले ख़र्चों को भोजन के साथ समायोजित कर ग्रामीण तथा शहरी विभाजन को समाप्त कर क्रय शक्ति समानता पर आधारित एक अखिल भारतीय ग़रीबी रेखा के निर्धारण पर है। यह अवधारणा के रूप में 1973-74 वाले मानकों से निश्चित रूप से बेहतर हैं जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम ज़रूरतों को सरकार द्वारा मुफ़्त उपलब्ध कराये जाने की मान्यता पर आधारित थे। लेकिन आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली अवधारणा को पूरी तरह से ख़त्म किया जाना, ख़ासतौर से तब जबकि पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय भूख सूचकांक में भारत को 66 वें पायदान पर रखा गया है, और खाद्यान्न संकट, खाद्यान्नों की क़ीमतों में अभूतपूर्व तेज़ी तथा कुपोषण की समस्या लगातार गहराती गयी है, इसकी नीयत पर सवाल उठाता ही है। इस दौर में पेश की गयी इस अवधारणा का अर्थ होगा कि ग़रीबी रेखा से वास्तविक ग़रीबों का बहुलांश बाहर रह जायेगा। यहां पर यह भी बता देना आवश्यक है कि कई हालिया अध्ययन बताते हैं कि सबसे ग़रीब दस फ़ीसदी लोगों का कैलोरी उपभोग सबसे अमीर दस फ़ीसदी लोगों के कैलोरी उपभोग से कम है जबकि यह तो सर्वज्ञात तथ्य है कि जहां अमीर आदमी तमाम दूसरी पोषक चीज़ों का उपभोग करता है वहीं ग़रीबों का वह तबका अपनी लगभग पूरी आय भोजन पर ही ख़र्च करता है।

दरअसल मानकों के न्यायपूर्ण निर्धारण के लिये जहां एक तरफ़ आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को इण्डियन काउंसिल आफ़ मेडिकल रिसर्च की पूर्व में उद्धृत अनुशंसा के आधार पर और ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए इसमें पोषण के लिये आवश्यक अन्य तत्वों के साथ समायोजित किया जाना चाहिये था और इसके साथ एक सम्मानजनक जीवनस्तर के लिये आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर, पीने का साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम चीज़ों से जोड़कर देखा जाना चाहिये था। इस संदर्भ में सेंटर फार आल्टरनेटिव पालिसी रिसर्च द्वारा मूलभूत आवश्यकताओं की क़ीमत पर आधारित ग़रीबी की विभाजक रेखा ज़्यादा न्यायपूर्ण लगती है जिसमें 2004-2005 के लिये अखिल भारतीय स्तर पर 840 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह का निर्धारण किया गया है ( विस्तार के लिये देखें (http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,953457,00 html#ix220×0pDZXVJ ) । इसके साथ ही एन के सक्सेना द्वारा सुझाये गये मानक भी सच के ज़्यादा करीब हैं।

साथ ही तेंदुलकर समिति ग़रीबी निर्धारण के आधारों में विस्तार के दावे के बावज़ूद ग़रीबी की बहुआयामी प्रकृति के बारे में कोई पहल नहीं करती। पहले की तमाम रिपोर्टों की तरह यह भी ग़रीबी को महज़ आर्थिक समस्या की तरह निरूपित करती है। इसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना इसे जड़मूल से समाप्त किया ही नहीं जा सकता। जाति, लिंग, शारीरिक अक्षमता, क्षेत्रीय असंतुलन जैसे तमाम कारक भारत में ग़रीबी को निर्धारित करते हैं।

दरअसल वस्तुस्थिति यह है कि ग़रीबी के इन तकनीकी निर्धारणों के मूल में उस बड़ी हक़ीक़त पर परदा डालना है कि इन सब क़वायदों के मूल में भयावह तरीके से विस्तारित होती आर्थिक असमानता की खाई के सवाल को दबाये रखना है। नई आर्थिक नीतियों से लाभान्वित होने वाले छोटे से तबके के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता और सामाजार्थिक समानता के उद्देश्य को पूर्ण तिलांजलि दे चुकीं शासन व्यवस्थाओं के लिये ग़रीबी उन्मूलन की योजनायें एक तरफ़ तो जनाक्रोशों को दबाये रखने वाले सेफ़्टी वाल्व हैं तो दूसरी तरफ़ हर पांच साल पर होने वाले चुनावों के मद्देनज़र एक आवश्यक फ़िज़ूलखर्ची। शायद लोकतंत्र के तहत हर पांच साल पर जनता के बीच जाने की मज़बूरी ही वह वज़ह है कि धनकुबेरों के प्रति अपने स्पष्ट झुकाव के बावज़ूद सरकारें ग़रीबों के नाम पर थोड़ा-बहुत ख़र्च करती हैं – लेकिन जहां अमीरों को सुविधायें हक़ की तरह दी जाती हैं वहीं वंचितों को ख़ैरात की तरह। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि ग़रीबी को एक असमाधेय समस्या के रूप में निरूपित कर नरेगा जैसी कुछेक योजनाओं द्वारा थोड़ा-बहुत लाभ एक सीमित आबादी तक पहुंचाया जाता है लेकिन भूमि सुधार, आय तथा व्यय पर करों द्वारा नियंत्रण तथा पुनर्वितरण जैसे बड़े और समस्या के जड़ पर प्रहार करने वाले उपाय सरकारों की कार्यसूची में शामिल ही नहीं होते। इस नई क़वायद के पीछे भी येन केन प्रकारेण आधिकारिक रूप से ग़रीबों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर रखना है जिससे कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में सब्सीडियों पर नियंत्रण रखा जा सके। खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को प्रेषित इस क़ानून के अवधारणा पत्र में साफ़ किया गया है कि ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के निर्धारण का अधिकार अनन्य रूप से केन्द्र सरकारों के पास ही रहेगा। राज्य सरकारों को टारगेटेड बीपीएल के अंतर्गत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या पर नियंत्रण रखने की ताक़ीद की गयी है। यह क़ानून इस सूची की सालाना समीक्षा को आवश्यक बना देगा। अपनी ड्राफ़्ट गाइडलाइन में यह पहले ही चेता चुका था कि अगर राज्य सरकारों पर बीपीएल सूची बनाने का काम छोड़ दिया गया तो भारत में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल ग्रामीण आबादी की 80-85 फ़ीसदी तक हो जाने की आशंका है। साफ़ है कि ऐसी नीयत के साथ बनने वाले खाद्य सुरक्षा क़ानून का हश्र भी कुछ दिनों पहले बने शिक्षा के अधिकार क़ानून जैसा ही होना है।

ग़रीबी रेखा के रूप में आय या आवश्यक कैलोरी उपभोग के किसी एक ख़ास आंकड़े को विभाजक बना देना रोज़ बदलती क़ीमतों और रोज़गार की अनिश्चितता की रोशनी में दरअसल एक भद्दा मज़ाक है। जब दाल 90 रुपये, चावल 20 रुपये, आटा 17 रुपये किलो बिक रहा है, डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है, दवायें इतनी मंहगी हैं और बसों तथा रेलों से कार्यस्थल तक पहुंचने में ही 10-15 रुपये ख़र्च हो जाते हैं तो दिल्ली में बैठकर यह तय करना कि 15 या 20 रुपये रोज़ में एक आदमी अपना ख़र्च चला सकता है और उससे अधिक पाने वालों को सहायता देने की कोई ज़रूरत नहीं है उस सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर देता है जो पिछले साल पिछले बज़ट में पूंजीपतियों को सहायता और करों में छूट के रूप में 4,18,095 करोड़ रुपयों की सौगात दे चुकी है। सरकार की पक्षधरता तो तभी स्पष्ट हो गयी थी जब मंदी से निपटने के नाम पर तो बेल आऊट पैकेज़ों के नाम पर अकूत राशि बांटी गयी लेकिन जिन लोगों ने अपने रोज़गार गंवाये या जिनकी तनख़्वाहों में कटौतियां की गयीं उन लोगों की सुरक्षा या इस संकट से उनके बेल आऊट के लिये कोई कदम उठाने की ज़रूरत महसूस नहीं की गयी। जनता के पक्ष में खड़ी एक सच्ची समाजवादी सरकार ऐसी स्थितियों में ग़रीबी के आंकड़ों पर नियंत्रण की जगह उन मूलभूत कारणों की जड़ों पर प्रहार करने की कोशिश करती जिनकी वज़ह से अर्थव्यवस्था में विषमता की ऐसी भयावह फांक पैदा होती है। वह प्रयास करती कि विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन में हो रहे संसाधनों के अपव्यय पर रोक लगा उन्हें अनाज़, शिक्षा, दवाओं और आम जन के उपभोग की ऐसी ही तमाम दूसरी चीज़ों के उत्पादन की तरफ़ मोड़कर जनता को इन्हें सस्ती क़ीमतों पर उपलब्ध कराया जाय। वह शिक्षा को बाज़ार के हाथों सौंपकर आम जन से दूर कर देने की जगह क्यूबा की तरह डाक्टरों की ऐसी फ़ौज़ पैदा करती जो न सिर्फ़ अपने देश बल्कि दुनिया भर के ग़रीब देशों में सस्ती और स्तरीय चिकित्सा उपलब्ध कराते। लेकिन भयावह ठंढ में कपड़ों में आग लगाकर पूर्ति को नियंत्रित करने वाली ( देखें पार्टी फॉर सोशलिज्म एण्ड लिबरेशन की वेबसाइट) वालमार्ट जैसी कंपनियों के स्वागत को बाहें पसारे लोग ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं?

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